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- Author, अमृता कदम
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
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प्रकाशित
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पढ़ने का समय: 11 मिनट
12 अगस्त, 1997 की सुबह टी-सिरीज़ के मालिक गुलशन कुमार हमेशा की तरह दर्शन करने के लिए अंधेरी के एक मंदिर में गए थे. दर्शन करने के बाद जब वे बाहर आए, तो उन पर गोलियाँ चलाई गईं.
उन्हें गोली लगी. वे जान बचाने के लिए भागने लगे और पास के एक सार्वजनिक शौचालय में घुस गए. हमलावर भी उनके पीछे आ गए. उन्होंने गुलशन कुमार पर 15 गोलियाँ चलाईं.
गुलशन कुमार पर कुल 16 गोलियाँ चलाई गईं. उनकी मौत हो गई.
गोलीबारी के दौरान हमलावर का मोबाइल फ़ोन चालू था. दूसरी तरफ़ मौजूद व्यक्ति सब कुछ सुन सकता था. हमलावर को ऐसा करने का आदेश ही दिया गया था, ताकि दूसरी तरफ बैठा व्यक्ति पूरी बात सुन सके. यह आदेश देने वाला व्यक्ति गैंगस्टर अबू सलेम था.
हुसैन ज़ैदी की किताब ‘डोंगरी से दुबई’ में इन सभी घटनाओं का विस्तार से ज़िक्र है.
15 से 20 मिनट तक चले इस थ्रिलर जैसे घटनाक्रम ने मुंबई और फ़िल्म उद्योग को झकझोर दिया. फिरौती देने से इनकार करने पर की गई यह हत्या फ़िल्म उद्योग के लिए चौंकाने वाली और दहशत भरी घटना थी.
इससे पहले भी मार्च 1997 में निर्माता मुकेश दुग्गल की हत्या कर दी गई थी. इस हत्या के तार भी अंडरवर्ल्ड से जुड़े हुए थे.
यह वह दौर था, जब आपराधिक जगत ने बॉलीवुड में ‘व्यावसायिक’ दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया था. यहीं से फ़िल्म उद्योग को आतंकित करने के लिए धमकियों और हमलों का सिलसिला शुरू हुआ.
फ़िल्म उद्योग में व्याप्त भय का यह दौर अभिनेता टाइगर श्रॉफ़ पर हुई गोलीबारी के बाद एक बार फिर सुर्ख़ियों में आ गया है.
रविवार (18 अक्तूबर) को जुहू इलाक़े में बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ़ की कार पर गोलीबारी हुई. इस मामले को लेकर कई ख़बरें प्रकाशित हो रही हैं. पुलिस ने अब तक 10 संदिग्धों को हिरासत में लिया है या गिरफ़्तार किया है.
जाँच इस बात की भी हो रही है कि हथियारों की कथित तस्करी कई राज्यों में कैसे हुई. साथ ही, हमलावरों को किए गए कथित वित्तीय लेनदेन की भी जाँच की जा रही है.
इस गोलीबारी की घटना ने भारत के सबसे कुख़्यात गैंगस्टरों में से एक लॉरेंस बिश्नोई का नाम फिर से सुर्ख़ियों में ला दिया है. हमले के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर एक पोस्ट का स्क्रीनशॉट वायरल हो गया. दावा किया गया कि यह पोस्ट बिश्नोई गिरोह के एक कथित सहयोगी ने किया था और उसने हमले की ज़िम्मेदारी ली थी.
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एक ऑडियो रिकॉर्डिंग भी सामने आई है, जिसमें खुद को अनिल पंडित बताने वाले व्यक्ति ने एक बार फिर हमले की ज़िम्मेदारी ली. उसने यह भी कहा कि टाइगर श्रॉफ़ को अभिनेता सलमान ख़ान के साथ रिश्ते के कारण निशाना बनाया गया.
हालाँकि, मुंबई पुलिस ने इन दावों की पुष्टि नहीं की है. यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि गोलीबारी की कोशिश के पीछे बिश्नोई गिरोह का हाथ था या नहीं. पुलिस इस बात की जाँच कर रही है कि हमले का आदेश किसने दिया और इसके पीछे क्या कारण था.
टाइगर श्रॉफ़ को निशाना बनाकर की गई यह घटना बॉलीवुड हस्तियों से जुड़ी धमकियों और हमलों की कड़ी के बाद हुई है. 2024 में सलमान ख़ान के घर के बाहर गोलीबारी हुई थी, जबकि इस साल की शुरुआत में फ़िल्म निर्देशक रोहित शेट्टी के घर के बाहर गोलीबारी हुई थी.
इन घटनाओं ने फ़िल्म उद्योग में संगठित अपराध की व्यापकता को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं. साथ ही, मुंबई के आपराधिक इतिहास के एक काले दौर की यादें भी ताज़ा कर दी हैं.
बॉलीवुड का आपराधिक गिरोहों से क्या संबंध रहा है?
हाजी मस्तान और बॉलीवुड
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फ़िल्म उद्योग और अंडरवर्ल्ड के बीच नज़दीकी को लेकर चर्चा की शुरुआत हाजी मस्तान से हुई.
हाजी मस्तान की मुंबई फ़िल्म उद्योग में काफ़ी दिलचस्पी थी. उन्होंने न सिर्फ़ कई फ़िल्मों का निर्माण किया, बल्कि एक संघर्षरत अभिनेत्री से शादी भी की.
पत्रकार और लेखक हुसैन ज़ैदी ने कहा, “मस्तान अपनी जवानी में मधुबाला का दीवाना था और उससे शादी करना चाहता था. लेकिन मधुबाला का असमय निधन हो गया और अगर वह जीवित भी होतीं, तो मस्तान कभी उनसे शादी नहीं कर पाता.”
“उस समय मुंबई में मधुबाला जैसी दिखने वाली एक अभिनेत्री काम कर रही थी. उसका नाम वीना शर्मा उर्फ़ सोना था. मस्तान ने उसे शादी का प्रस्ताव दिया और उसने तुरंत स्वीकार कर लिया. मस्तान ने सोना के लिए जुहू में एक घर ख़रीदा और उसके साथ वहीं रहने लगा.”
धीरे-धीरे मुंबई के वीआईपी सर्कल में मस्तान की स्थिति मज़बूत होने लगी और लोग उसके तस्करी के दिनों को भूलने लगे. हाजी मस्तान की पहली पत्नी से तीन बेटियाँ थीं. बाद में उन्होंने सुंदर शेखर नाम के एक बेटे को गोद लिया था.
सुंदर शेखर ने कहा था, “फ़िल्म इंडस्ट्री में कई लोग बाबा के क़रीबी थे. राज कपूर, दिलीप कुमार और संजीव कुमार उनमें प्रमुख थे. फ़िल्म ‘दीवार’ की शूटिंग के दौरान फ़िल्म के लेखक सलीम और अमिताभ बच्चन अक्सर बाबा से मिलने आते थे, ताकि वे किरदार को और गहराई से समझ सकें. बाबा हमेशा अपने बाल पीछे की ओर सँवारते थे. अगर कोई उनसे अंग्रेज़ी में बात करने लगता, तो वे बार-बार ‘या-या’ कहते थे.”
अंडरवर्ल्ड की सिनेमा में ‘व्यावसायिक’ दिलचस्पी
हाजी मस्तान सिनेमा की दुनिया से आकर्षित थे. लेकिन 1990 के दशक के बाद अंडरवर्ल्ड ने सिनेमा में व्यावसायिक दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी. इस कारोबार में पैसा था और इसी वजह से कई गैंगस्टर इसकी ओर आकर्षित हुए.
1999 में एक स्पॉटबॉय फ़िल्म निर्माता बन गया. उस फ़िल्म में तत्कालीन सुपरस्टार सलमान ख़ान ने मुख्य भूमिका निभाई थी. यह स्पॉटबॉय नाज़िम रिज़वी था, जो भारतीय भगोड़े गैंगस्टर और दाऊद इब्राहिम के क़रीबी छोटा शकील का ख़ास गुर्गा था. फ़िल्म का नाम था ‘चोरी चोरी चुपके चुपके’.
महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक और मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त डी. शिवानंदन ने इस पूरे मामले की जाँच की थी. उन्होंने अपनी किताब ‘द ब्रह्मास्त्र अनलीश्ड’ में इस मामले का विस्तार से वर्णन किया है.
1999 में शिवानंदन को अपने एक सूत्र से जानकारी मिली. इसके मुताबिक़, “शकील आतंकवादी गतिविधियों से कमाए गए पैसों से एक हिंदी फ़िल्म बनाना चाहता था. यह पैसा हवाला के ज़रिए एक करोड़पति हीरा व्यापारी और कारोबारी को हस्तांतरित किया जाना था. यह जानकारी थी कि वह कारोबारी इस पैसे को फ़िल्म निर्माताओं तक पहुँचाएगा. वो कारोबारी भरत शाह थे.”
यह जानकारी मिलने के बाद शिवानंदन ने तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) से मुलाक़ात की और रिज़वी के फ़ोन को टैप करने की अनुमति हासिल की. उन्हें अनुमति मिल गई.
शकील का रिज़वी से रोज़ाना संपर्क था. इन फ़ोन कॉल से कई अन्य चौंकाने वाले खुलासे भी हुए. इनमें निर्माता-निर्देशक राकेश रोशन पर हमला करने की योजना भी शामिल थी, क्योंकि उन्होंने शकील की फिरौती की माँग का जवाब नहीं दिया था.
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इसी बीच शकील और रिज़वी अपनी फ़िल्म के प्रचार और रिलीज़ की योजनाओं पर भी चर्चा कर रहे थे.
इन सभी मामलों में मुंबई क्राइम ब्रांच ने 2000 में एफ़आईआर दर्ज की थी. नाज़िम रिज़वी और अब्दुल रहीम ख़ान को गिरफ़्तार किया गया था. भरत शाह को भी जनवरी 2001 में गिरफ़्तार किया गया था. इस मामले में महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (एमसीओसीए), भारतीय दंड संहिता और भारतीय शस्त्र अधिनियम की धाराओं के तहत दो से ज़्यादा आरोपपत्र दाख़िल किए गए थे.
मुक़दमे की सुनवाई के दौरान जिन 76 गवाहों से पूछताछ की गई, उनमें से 14 बॉलीवुड अभिनेता थे. लेकिन प्रीति ज़िंटा को छोड़कर बाक़ी सभी गवाहों ने आपराधिक जगत के ख़िलाफ़ गवाही दी थी. शिवानंदन ने अपनी किताब में यह लिखा है.
मुक़दमा दो साल तक चला. विशेष अदालत के न्यायाधीश ए.पी. बंगले ने भरत शाह को दोषी ठहराया. नाज़िम रिज़वी और अब्दुल रहीम को छह साल की क़ैद की सज़ा सुनाई गई.
गुलशन कुमार की हत्या, बॉलीवुड की अन्य हस्तियों पर हमले
इस कहानी की शुरुआत में ज़िक्र की गई गुलशन कुमार की हत्या फ़िल्म जगत में दहशत फैलाने की एक चरम कोशिश थी.
इस हमले में जिस नाम का खुलासा हुआ, वह अबू सलेम था.
मूल रूप से उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ के रहने वाले सलेम ने 1993 के बम धमाकों से पहले दाऊद इब्राहिम के भाई अनीस इब्राहिम के लिए ड्राइवर और डिलीवरी ड्राइवर के तौर पर काम किया था.
अनीस कभी-कभी फ़ोन पर अबू सलेम को सलाह देता था. दाऊद से उसका कोई सीधा संपर्क नहीं था, लेकिन उसे अब ऐसा लगने लगा था कि अबू सलेम ‘समझदार’ हो गया है.
हुसैन ज़ैदी के मुताबिक़, 1993 में फ़िल्म अभिनेता संजय दत्त ने अनीस को फ़ोन किया और बताया कि उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं और अपनी सुरक्षा के लिए उन्हें कुछ बंदूक़ें चाहिए.
इसके बाद अनीस ने अबू सलेम को बुलाया और कहा, “जाओ, मशीन गन संजू को दे दो.” अबू सलेम के जीवन में यह पहली बार था, जब वह किसी फ़िल्म अभिनेता से मिला था.
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मुंबई धमाकों के बाद दर्ज किए गए एक बयान में अबू सलेम ने कहा कि अभिनेता को सामने से देखकर वह स्तब्ध रह गया था. उसने संजय दत्त को कम से कम तीन बार गले लगाया.
हालाँकि, बाद में संजय दत्त ने कहा कि उन्हें इतनी बंदूक़ें नहीं चाहिए और एक बंदूक़ ही काफ़ी है. इसलिए सलेम को बंदूक़ लेकर वापस लौटना पड़ा.
मीडिया ने उसे ‘डॉन’ का नाम दिया, लेकिन उस समय उसके ख़िलाफ़ कोई बड़ा अपराध दर्ज नहीं था. उसका सबसे बड़ा अपराध हथियारों की आपूर्ति करना था. लेकिन दुबई जाने के बाद अनीस के अधीन काम करते हुए उसने फ़ोन पर लोगों को धमकाना शुरू कर दिया. इसीलिए लोग उसे ‘डॉन’ समझने लगे.
इसके बाद अबू सलेम ने फ़िल्म निर्माता गुलशन कुमार की हत्या की साज़िश रची और उसे अंजाम दिया. इस घटना के बाद वह कुख़्यात हो गया.
वरिष्ठ पत्रकार चंद्रमोहन पुप्पाला ने गुलशन कुमार की हत्या की ख़बर दी थी.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने इस बारे में कहा, “मुंबई पुलिस को पहले ही इस मामले में ऐसी घटना की आशंका की सूचना मिल चुकी थी. उस दौरान गुंडे अख़बारों के दफ़्तरों में फ़ोन करते थे. वे पत्रकारों के ज़रिए जनता तक अपना पक्ष या बयान पहुँचाने की कोशिश करते थे.”
पुप्पाला के मुताबिक़, अपराध की ख़बरें कवर करने वाले पत्रकारों के पुलिस अधिकारियों और आपराधिक जगत के सूत्रों से संपर्क होते थे. वे अलग-अलग स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर ख़बरें लिखते थे.
गुलशन कुमार की हत्या का ज़िक्र करते हुए पुप्पाला ने कहा कि यह जानकारी सामने आई थी कि उन्हें धमकियाँ मिल रही थीं.
“उस समय कुछ लोगों ने इन धमकियों को गंभीरता से लिया और अपनी सुरक्षा के लिए इंतज़ाम किए. उस समय गुंडे किसी पर हमला करके अपना आतंक और दबदबा क़ायम करने की कोशिश करते थे.”
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निर्माता-निर्देशक और अभिनेता ऋतिक रोशन के पिता राकेश रोशन पर 21 जनवरी, 2000 को हमला हुआ था. यह हमला तब हुआ, जब उन्होंने एक गैंगस्टर की फिरौती की माँग ठुकरा दी थी.
‘गुप्त’ जैसी सफल फ़िल्मों के निर्देशक राजीव राय पर भी 1997 में हमला हुआ था. राजीव राय पर मध्य मुंबई में अबू सलेम गिरोह से कथित तौर पर जुड़े पाँच हमलावरों ने हमला किया था.
राय पर उस समय गोली चलाई गई, जब वह अपने दफ़्तर से निकल रहे थे. राय को पहले भी धमकियाँ मिल चुकी थीं.
इसलिए उन्हें सुरक्षा और अंगरक्षक मुहैया कराए गए थे. इन अंगरक्षकों ने हमलावरों को रोक दिया. यह भी कहा जाता है कि मुठभेड़ के दौरान एक हमलावर घायल हो गया था.
गैंगस्टर फ़िल्म उद्योग में दिलचस्पी क्यों रखते हैं?
फ़िल्म उद्योग में अंडरवर्ल्ड की ओर से कथित तौर पर किए गए वित्तीय लेन देन और निवेश के बारे में चंद्रमोहन पुप्पाला ने कहा कि फ़िल्म कारोबार से पैसा कमाने की संभावना को देखते हुए गैंगस्टरों ने सोचा कि वे नक़दी का निवेश करके इससे फ़ायदा कमा सकते हैं.
पुप्पाला का कहना है कि फ़िल्म सितारों से संपर्क स्थापित करना भी गुंडों के लिए आकर्षण का एक स्रोत था.
उनका यह भी मानना था कि किसी सेलिब्रिटी के साथ क़रीबी संबंध दिखाने से उनकी पहचान बढ़ सकती है और आपराधिक दुनिया में उनकी स्थिति और प्रभाव मज़बूत हो सकता है.
पुप्पाला के मुताबिक़, कुछ गुंडे फ़िल्म अभिनेताओं को पार्टियों और कार्यक्रमों में बुलाते थे. उन्होंने फ़िल्मों में निवेश करने की कोशिशों का भी ज़िक्र किया.
अबू सलेम का उदाहरण देते हुए पुप्पाला ने कहा कि उस दौरान फ़िल्म उद्योग में निवेश करने, कथित संरक्षण देने और अलग-अलग माँगों से जुड़े मामलों में अपना प्रभाव स्थापित करने की कोशिशें की गई थीं.
पुप्पाला के मुताबिक़, कुछ गुंडे दावा करते थे कि वे फ़िल्म उद्योग में निवेश या सुरक्षा से जुड़े मामलों को संभाल सकते हैं. वे ऐसे दावों और आरोपों के ज़रिए अपना दबदबा दिखाने की कोशिश भी करते थे.
एक बार फिर अंडरवर्ल्ड के आतंक के साये में बॉलीवुड
टाइगर श्रॉफ़ पर हुए हमले के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या बॉलीवुड में एक बार फिर दहशत का माहौल बन रहा है.
बीबीसी हिंदी ने चंद्रमोहन पुप्पाला से भी यही सवाल पूछा. उन्होंने कहा, “इसे दोबारा कहना सही नहीं होगा. हम इस तरह की घटनाएँ नियमित अंतराल पर होते देखते हैं.”
फ़रवरी 2026 में निर्देशक रोहित शेट्टी के घर के पास जुहू में गोलीबारी हुई थी.
पुलिस ने बताया था कि यह हमला शुभम लोनकर गिरोह ने किया था. पुलिस ने यह भी कहा था कि हमले का मक़सद फिरौती वसूलकर दहशत फैलाना था.
सितंबर 2025 में उत्तर प्रदेश के बरेली में अभिनेत्री दिशा पाटनी के पिता जगदीश पाटनी के घर के बाहर अज्ञात लोगों ने गोलीबारी की थी.
इस हमले की ज़िम्मेदारी गोल्डी बराड़ और रोहित गोदारा के गिरोह ने ली थी. उन्होंने सोशल मीडिया के ज़रिए हमले की ज़िम्मेदारी स्वीकार की थी.
डी. शिवानंदन का मानना है कि आतंक के वे दिन वापस नहीं लौटे हैं. उनके मुताबिक़, उन्होंने दाऊद इब्राहिम, छोटा शकील, अरुण गवली और दूसरे अपराधियों का पीछा किया था. हालाँकि, इन अपराधियों के सरगना विदेश से काम करते थे, लेकिन उनके अनुयायी मुंबई के आपराधिक गिरोहों में गहराई से जुड़े हुए थे.
“ये वे माफ़िया नहीं हैं, जिन्हें हमने पिछले 60 सालों में मुंबई में देखा है. ये कुछ अलग हैं.”
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लॉरेंस बिश्नोई का नाम इस नए आपराधिक जगत से जुड़ा हुआ है. उत्तर भारत के एक गाँव से ताल्लुक़ रखने वाले बिश्नोई कई सालों से जेल में हैं और उनकी छवि लोककथाओं के खलनायक जैसी बन चुकी है. ऐसा कहा जाता है कि वो जेल से ही अलग-अलग देशों में हमलावरों को आदेश दे रहे हैं. उनका नाम अक्सर धमकियों और हमलों की ज़िम्मेदारी लेने के दावों में सामने आता है. इस तरह के दावे अक्सर ऑनलाइन फैलाए जाते हैं.
लॉरेंस बिश्नोई ने काले हिरण के शिकार के मामले को लेकर सलमान ख़ान को सार्वजनिक रूप से धमकी दी थी. 1998 के इस मामले में ख़ान पर चिंकारा के शिकार का आरोप था. चिंकारा हिरण परिवार का एक जानवर है और बिश्नोई समुदाय में इसे पवित्र माना जाता है.
अप्रैल 2024 में सलमान ख़ान के मुंबई स्थित घर के बाहर पाँच गोलियाँ चलाई गई थीं. छह महीने बाद सलमान ख़ान और अन्य फ़िल्म सितारों के क़रीबी माने जाने वाले राजनेता बाबा सिद्दीकी की हत्या कर दी गई थी.
मुंबई पुलिस ने इन दोनों हमलों को बिश्नोई गिरोह से जोड़ा है. हालाँकि, सिद्दीकी की हत्या में लॉरेंस बिश्नोई की व्यक्तिगत संलिप्तता अभी तक साबित नहीं हुई है.
बिश्नोई गिरोह से जुड़े कुछ आरोप पुलिस की जाँच पर आधारित हैं, जबकि अन्य की पुष्टि अभी बाक़ी है. हालाँकि, इस गिरोह की ओर से वास्तव में किए गए अपराधों और इसके नाम पर किए गए दावों के बीच का अंतर आम लोगों के मन में अक्सर धुँधला रहता है. यही वजह है कि इस नए गिरोह का डर दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है.
संदर्भ- दुबई टू डोंगरी- हुसैन झैदी; द ब्रह्मास्त्र अनलिश्ड- डी शिवानंदन
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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