साबरमती जेल में लॉरेंस बिश्नोई, फिर बॉलीवुड में गोलीबारी और वसूली का नेटवर्क कैसे चल रहा है?


“अगर इस दुनिया में कोई चीज पक्की है, अगर इतिहास ने हमें कुछ सिखाया है,” तो वह यह है कि “आप किसी को भी मार सकते हैं.” फिल्म ‘द गॉडफादर पार्ट II’ में माइकल कॉर्लियोन यह कहता है.

उसकी बात पूरी तरह सही नहीं थी. मुंबई में टाइगर श्रॉफ को लगभग बिल्कुल करीब से मारने की कोशिश करने वाले दो लोग नाकाम रहे. ऐसा लगता है कि उनकी बंदूकों में से एक जाम हो गई थी. लेकिन मुंबई के अंडरवर्ल्ड का इतिहास बताता है कि कॉर्लियोन (या फ्रांसिस फोर्ड कोपोला, जिन्हें कभी-कभी इस संवाद को लिखने का श्रेय दिया जाता है) की बात सही थी. कई सालों तक अंडरवर्ल्ड के लोग जिसे चाहते थे, उसे मार देते थे. उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता था कि उनका शिकार कहां है. घर पर, मंदिर में, कार में या यहां तक कि लोगों से भरी अदालत में भी. और अब यह सब फिर से शुरू हो रहा है.

1970 के दशक से ही फिल्म इंडस्ट्री और गैंगस्टरों की दुनिया के बीच संबंध रहा है. पुराने समय में जब फिल्मों में कानून तोड़ने वाले लोगों की कहानी दिखानी होती थी, तो फिल्मकार डाकुओं का सहारा लेते थे. ‘गंगा जमुना’, ‘मुझे जीने दो’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’ और ‘मेरा गांव, मेरा देश’ जैसी फिल्में इसका उदाहरण हैं. यह चलन ‘शोले’ के साथ अपने चरम पर पहुंच गया.

लेकिन जब लेखक सलीम और जावेद ‘शोले’ की कहानी लिख रहे थे, उसी समय वे एक नई तरह की फिल्मों की शुरुआत भी कर रहे थे. उन्होंने ‘गंगा जमुना’ की कहानी के विचार को लेकर ‘दीवार’ लिखी और उसे चंबल की घाटियों के बजाय मुंबई के बंदरगाहों के इलाके में दिखाया. फिल्म इंडस्ट्री में यह बात किसी से छिपी नहीं थी कि ‘दीवार’, जो ‘शोले’ से कुछ महीने पहले रिलीज हुई थी, तस्कर और गैंगस्टर हाजी मस्तान की जिंदगी पर कुछ हद तक आधारित थी.

फिल्म सुपरहिट हुई और इसके साथ फिल्म इंडस्ट्री और अंडरवर्ल्ड के बीच एक नए प्रेम संबंध की शुरुआत हुई. मस्तान को लोगों का ध्यान पसंद था. उसे फिल्मी सितारों के साथ उठना-बैठना अच्छा लगता था. उसने और फिल्मों में पैसा लगाया और खबरों के मुताबिक, अपनी जिंदगी पर एक फिल्म भी बनवाने की कोशिश की, जिसमें वह खुद अपना किरदार निभाने वाला था. (यह फिल्म कभी पूरी नहीं हो पाई.)

यह सोचना अच्छा लगेगा कि फिल्म इंडस्ट्री ने डर की वजह से मस्तान को बर्दाश्त किया. लेकिन असलियत यह थी कि इंडस्ट्री के लोग उसे पसंद करते थे. उन्हें गैंगस्टरों के साथ रहने से मिलने वाले खतरे के रोमांच में भी मजा आता था. इसके अलावा, गैंगस्टरों के पास पैसा था, जिसे वे फिल्म इंडस्ट्री में लगाते थे.

पुराना रिश्ता फिर से खराब होने लगा

जब मस्तान की पीढ़ी के गैंगस्टर दुनिया से चले गए और नए गैंगस्टरों का दबदबा शुरू हुआ, तब तक फिल्म इंडस्ट्री पूरी तरह इस रिश्ते में शामिल हो चुकी थी.

दुबई में दाऊद इब्राहिम फिल्मी सितारों की मेजबानी करता था. गैंगस्टर फिल्मी सितारों के लाइव शो आयोजित करते थे और संगीत तथा वीडियो कैसेट के कारोबार पर कब्जा करने लगे थे.

अंडरवर्ल्ड पर आधारित फिल्मों का एक नया दौर शुरू हुआ. इनमें से कुछ फिल्में असली गैंगस्टरों की जिंदगी पर आधारित थीं. मणिरत्नम की ‘नायकन’, जिसका हिंदी में रीमेक ‘दयावान’ नाम से बना, से लेकर राम गोपाल वर्मा की ‘सत्या’ तक ऐसी कई फिल्में आईं. ‘नायकन’ गैंगस्टर वरदराजन मुदलियार पर आधारित थी. उसी गैंगस्टर से प्रेरित होकर अमिताभ बच्चन ने फिल्म ‘अग्निपथ’ में अपनी आवाज और बोलने का अंदाज अपनाया था.

लेकिन जब आप शैतान के साथ नाचते हैं, तो उसका अंजाम हमेशा भुगतना पड़ता है. गैंगस्टर फिल्मी सितारों से वफादारी की मांग करने लगे. उनके विरोधी गैंग दूसरे अपराधी गुटों के करीब माने जाने वाले अभिनेताओं को निशाना बनाने लगे.

गैंगस्टर पहले फिल्मी सितारों को जिस हैरानी और दीवानगी से देखते थे, वह खत्म हो गई. अब अगर कोई सितारा किसी अपराधी के पैसे से बन रही फिल्म में काम करने से मना करता, तो उसकी जान को खतरा हो जाता था. निर्माताओं पर दबाव डाला जाता था कि वे अपनी फिल्मों के वितरण के अधिकार अंडरवर्ल्ड को बेच दें.

1993 के मुंबई बम धमाकों के बाद गैंगस्टरों और फिल्मी सितारों के बीच संबंध सार्वजनिक रूप से सामने आ गए.

पुलिस ने संजय दत्त को इन धमाकों के सिलसिले में गिरफ्तार किया. उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने परिवार की सुरक्षा के लिए ही एक असॉल्ट राइफल ली थी. हो सकता है कि उनकी यह बात सच रही हो, लेकिन पुलिस का कहना था कि उन्हें यह राइफल अंडरवर्ल्ड में अपने दोस्तों से मिली थी.

धमाकों के मामले में दत्त को आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराया गया. हनीफ-समीरी की जोड़ी भी इस मामले में फंस गई. ये दोनों वीडियो कैसेट के बाजार पर राज करते थे और लंबे समय से इनके अंडरवर्ल्ड से संबंध होने की अफवाहें थीं. दत्त को राइफल भी इन्होंने ही दी थी.

आखिरकार, समीरी को कई साल की जेल की सजा सुनाई गई, जबकि फैसले से पहले ही हनीफ की हत्या कर दी गई.

मुंबई पुलिस ने फिल्म इंडस्ट्री और अंडरवर्ल्ड के बीच संबंधों के खिलाफ अभियान चलाया. इसके बाद गैंगस्टरों का प्रभाव कम होने लगा. फिल्म इंडस्ट्री ने फिर से राहत की सांस लेना शुरू किया. जबरन वसूली के कुछ मामलों को छोड़ दें, तो गैंगस्टरों ने फिल्म इंडस्ट्री से दूरी बनाना सीख लिया.

लेकिन पिछले कुछ सालों की घटनाओं को देखकर लगता है कि वह दौर खत्म हो चुका है.

लगभग हर महीने कोई नया हमला या नई धमकी सामने आती है. अप्रैल 2024 में बाइक पर आए दो लोगों ने सलमान खान के घर पर कई गोलियां चलाईं. राहत की बात थी कि सलमान को कोई चोट नहीं आई.

कुछ महीने बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के नेता बाबा सिद्दीकी की उनके बेटे के ऑफिस के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई.

सितंबर 2025 में अभिनेत्री दिशा पाटनी को धमकियां मिलीं. इसके बाद उनके परिवार के घर पर गोलीबारी हुई.

इस साल फरवरी में निर्देशक रोहित शेट्टी के घर पर पांच गोलियां चलाई गईं. उसी महीने अभिनेता रणवीर सिंह से जबरन वसूली की मांग की गई और उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलीं. सलमान के जीजा आयुष शर्मा को भी जबरन वसूली की मांग और धमकियों का सामना करना पड़ा.

और ये सिर्फ वे मामले हैं जिनमें फिल्म इंडस्ट्री के लोगों ने गैंगस्टरों की धमकियों को नजरअंदाज करने और पुलिस के पास जाने की हिम्मत दिखाई. यह कहना मुश्किल है कि ऐसे कितने और लोगों को पुलिस से बात करने पर जान से मारने की धमकी दी गई है.

रहस्यमय इरादे

आज के हमलों और 20 साल पहले हुए हमलों के बीच कुछ समानताएं हैं. लेकिन कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं.

इस बार ऐसा नहीं लगता कि गैंगस्टर फिल्मी सितारों से प्रभावित हैं या फिल्म इंडस्ट्री पर कब्जा करना चाहते हैं. ऐसा लगता है कि उनका मुख्य मकसद जबरन वसूली करना है.

लेकिन इससे और सवाल खड़े होते हैं. अगर पूरा मामला पैसों का है, तो फिल्मी सितारों को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है, जबकि भारत में हजारों ऐसे कारोबारी हैं जिनके पास कहीं ज्यादा पैसा है?

अंडरवर्ल्ड के इरादे भी पूरी तरह साफ नहीं हैं. हर हमले के बाद गैंगस्टर सोशल मीडिया पर संदेश डालते हैं. इनमें अक्सर सलमान खान का जिक्र होता है. कहा जाता है कि जिन लोगों को निशाना बनाया गया, उनमें से लगभग सभी की गलती यह है कि वे सलमान के दोस्त हैं.

सलमान को लेकर यह जुनून क्यों है? या फिर क्या यह सिर्फ एक सुविधाजनक बहाना है?

कभी-कभी सोशल मीडिया पर डाले गए संदेशों में आरोप लगाया जाता है कि निशाना बनाए गए व्यक्ति ने किसी हिंदू धार्मिक प्रतीक का अपमान किया है और हमला उसी का बदला है. इन बातों का कोई खास मतलब समझ नहीं आता.

पुलिस भी हमलावरों को पकड़ने के बाद उनसे ज्यादा जानकारी हासिल करती हुई नहीं दिखती.

सलमान के घर पर हुए हमले के मामले में छह लोगों को गिरफ्तार किया गया था. लेकिन पुलिस को लगभग कुछ भी पता नहीं चला. हालांकि, जब आरोपियों में से एक ने कथित तौर पर हिरासत में ‘आत्महत्या कर ली’, तो साफ है कि पुलिस ने उनसे काफी ‘पूछताछ’ की होगी.

बाबा सिद्दीकी की हत्या के मामले में भी ऐसा ही हुआ. पुलिस का कहना है कि गोली चलाने वाले लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है.

दिशा पाटनी के मामले में गोली चलाने वाले लोगों को पुलिस के साथ मुठभेड़ में ‘मार गिराया गया’.

लगभग हर मामले में यही कहानी है. गोली चलाने वाले लोग बेरोजगार युवा दिखाई देते हैं, जिन्होंने पैसों के लिए हत्या या हमला किया. उन्हें यह भी पता नहीं था कि इसके पीछे कौन है या ऐसा करने का मकसद क्या है.

जांच की कड़ी लगभग हमेशा लॉरेंस बिश्नोई नाम के गैंगस्टर तक पहुंचती है. गैंगस्टरों के सोशल मीडिया संदेशों में आमतौर पर उसका नाम लिया जाता है और हमलावर दावा करते हैं कि वही उनका सरगना है.

गुजरात से जुड़ा मामला

इस पूरे हत्याकांड और हिंसा के बीच सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि लॉरेंस बिश्नोई अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद है.

उसका भाई अनमोल, जिसे पिछले साल के आखिर में अमेरिकी अधिकारियों ने भारत भेजा था, वह भी भारतीय जेल में बंद है. उसके मामले में यह जेल दिल्ली की तिहाड़ जेल है.

ऐसा कोई दूसरा मामला याद करना मुश्किल है, जिसमें जेल में बंद कोई व्यक्ति अपनी कोठरी में बैठे-बैठे इतनी बड़ी तबाही मचा सके.

इसके अलावा, पुलिस अधिकारी शिकायत करते हैं कि गृह मंत्रालय कानूनी पाबंदियों का हवाला देकर गुजरात की जेल में बंद बिश्नोई को उसकी कोठरी से बाहर ले जाने की अनुमति नहीं देता. इस वजह से पुलिस उसके इरादों और काम करने के तरीके की जांच नहीं कर पाती.

अगर जांचकर्ताओं को बिश्नोई की हिरासत मिल जाए, तो क्या वह उन्हें वे जवाब दे पाएगा जो वे जानना चाहते हैं? या फिर वह भी ‘हिरासत में आत्महत्या कर लेगा’?

इसके अलावा, अगर वही सच में इन हमलों का मुख्य साजिशकर्ता है, तो वह जेल की कोठरी के अंदर से अपने गैंग के लोगों से संपर्क कैसे करता है? इस बारे में कोई कुछ बताने को तैयार नहीं है.

अगर वह गुजरात की जेल के अंदर से एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी गिरोह चला सकता है, तो वहां जेल की स्थिति कैसी है?

इसलिए, हालांकि अंडरवर्ल्ड की ओर से फिल्मी सितारों पर पहले भी हमले किए जाते रहे हैं, लेकिन इस बार फिल्म इंडस्ट्री के खिलाफ चल रहा अभियान काफी अलग है. इसकी वजह यह है कि हमलों के पीछे के इरादे साफ नहीं हैं और जिस गैंग लीडर पर इनका आरोप है, वह भारत सरकार की हिरासत में है.

अब तक केंद्र सरकार ने बिश्नोई से जुड़े किसी भी अहम सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दिया है.

लेकिन माइकल कॉर्लियोन ने कहा था कि अगर कोई गैंगस्टर सच में किसी को मारना चाहता है, तो देर-सवेर वह ऐसा कर ही देगा.

मुझे नहीं पता कि केंद्र सरकार को इस बात का एहसास है या नहीं कि वह बारूद के ढेर पर बैठी है. जिस दिन किसी बड़े फिल्मी सितारे की हत्या हो जाएगी, उस दिन पूरा भारत देश की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाएगा.

और लोग यह सवाल जरूर पूछेंगे: गुजरात की जेल के अंदर बैठकर एक गैंगस्टर इस तरह हिंसा कैसे फैला रहा है?

वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविज़न पत्रकार और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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