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2018 में थिएटर में आई फिल्म ‘बधाई हो’ न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर सफल रही, बल्कि समाज की उस सोच पर भी कड़ी आलोचना की, जिसके बारे में लोग बंद कमरों में बात करने से भी हिचकिचाते हैं. सिर्फ 29 करोड़ के मामूली बजट में बनी इस फिल्म ने दुनिया भर में 221 करोड़ कमाए. 123 मिनट की यह हल्की-फुल्की कॉमेडी आज भी आपको हंसा सकती है, लेकिन इसकी शुरुआती स्क्रिप्ट एक बहुत ही गंभीर और जरूरी मुद्दे पर आधारित थी. तो आइए, इस मास्टरपीस के बारे में कुछ दिलचस्प बातें जानें.
नई दिल्ली. फिल्म इंडस्ट्री में अक्सर बड़े बजट और बड़े सुपरस्टार वाली फिल्मों को ही बॉक्स ऑफिस पर सफल माना जाता है. लेकिन ‘बधाई हो’ ने इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया. सिर्फ 29 करोड़ के बजट में बनी इस कम बजट की फिल्म ने घरेलू और इंटरनेशनल बॉक्स ऑफिस पर ऐसा धमाल मचाया कि इसकी कमाई 221 करोड़ से ज्यादा हो गई. मजबूत कंटेंट और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी कहानी के साथ इस फिल्म ने न सिर्फ अपनी लागत निकाली, बल्कि 2018 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली सुपरहिट फिल्मों में भी जगह बनाई.
यह 123 मिनट (2 घंटे और 3 मिनट) की फिल्म दर्शकों को कभी बोर नहीं करती. हालांकि, कम ही लोग जानते हैं कि इस फिल्म का शुरुआती ड्राफ्ट एक बहुत ही सीरियस और इमोशनल ड्रामा के तौर पर लिखा गया था. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो जब राइटर शांतनु श्रीवास्तव और अक्षत घिल्डियाल इस सब्जेक्ट पर काम कर रहे थे, तो यह मुख्य रूप से समाज के तानों, शर्मिंदगी और पारिवारिक तनावों पर फोकस था.
लेकिन, डायरेक्टर अमित शर्मा ने इसमें सिचुएशनल कॉमेडी और सटायर का टच देने का फैसला किया. नतीजतन, एक सीरियस सोशल मुद्दे को इतनी ग्रेस और ह्यूमर के साथ पेश किया गया कि ऑडियंस उससे कनेक्ट कर पाई. ‘बधाई हो’ की कहानी कौशिक फैमिली के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां एक मिडिल-एज कपल (गजराज राव और नीना गुप्ता) अनचाही प्रेग्नेंसी का सामना करते हैं.
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जब उनके छोटे और शादी लायक बेटे नकुल (आयुष्मान खुराना) को यह पता चलता है, तो पूरा परिवार सोशल शर्मिंदगी और तानों के डर में डूब जाता है. मिडिल-क्लास इंडियन सोसाइटी में माता-पिता की सेक्सुअलिटी और बुढ़ापे में बच्चे पैदा करने जैसे टैबू टॉपिक पर बात करना भी पाप माना जाता है. फिल्म ने इस सेंसिटिव मुद्दे को बिना किसी वल्गैरिटी के इज्जतदार और ह्यूमरस तरीके से बड़े पर्दे पर दिखाया.
हालांकि आयुष्मान खुराना और सान्या मल्होत्रा ने बेहतरीन परफॉर्मेंस दी, लेकिन फिल्म की असली ताकत इसकी सीनियर कास्ट में थी. स्वर्गीय सुरेखा सीकरी का दादी का रोल इतना जानदार और दिल को छूने वाला था कि उन्हें नेशनल फिल्म अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.
गजराज राव (जितेंद्र कौशिक) और नीना गुप्ता (प्रियंवदा कौशिक) के बीच का मैच्योर प्यार और मासूमियत दर्शकों के दिलों को छू गई. सास-बहू के बीच खट्टे-मीठे रिश्ते और परिवार की एकता ने इस फिल्म को सिर्फ एक कॉमेडी नहीं, बल्कि एक पूरा फैमिली ड्रामा बना दिया.
‘बधाई हो’ ने साबित कर दिया कि अगर कहानी दिलचस्प हो और प्रेजेंटेशन ईमानदार हो तो दर्शक बोल्ड या अनोखे सब्जेक्ट को आसानी से अपना लेते हैं. इस फिल्म ने बॉलीवुड में ‘कंटेंट-ड्रिवन सिनेमा’ की एक नई लहर शुरू की.
इसने समाज को यह मानने पर मजबूर किया कि माता-पिता की भी अपनी पर्सनल जिंदगी और इमोशंस होते हैं और उम्र खुशियों का स्वागत करने में रुकावट नहीं बननी चाहिए. 8 साल बाद भी यह फिल्म जब भी लोग देखते हैं तो उनके चेहरों पर मुस्कान आ जाती है.