एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। कहते हैं ना जब वक्त अच्छा हो तो किस्मत भी साथ देती है। कुछ ऐसा ही हुआ था भारतीय सिनेमा के दिग्गज एक्टर मिथुन चक्रवर्ती के साथ। 80-90 के दशक में उन्होंने एक से बढ़कर एक फिल्में दीं लेकिन उसके पहले उनकी लगातार 20 फिल्में बैक टू बैक फ्लॉप हुई थीं।
20 फिल्में हुई थीं बैक टू बैक फ्लॉप
90 के दशक में मिथुन चक्रवर्ती (Mithun Chakraborty) एक साल में लगभग 10-12 फिल्में कर रहे थे। एक साथ इतनी फिल्में करने की वजह से उनकी फिल्मों की क्वालिटी पर असर पड़ा और उनकी लगातार 20 फिल्में फ्लॉप या एवरेज साबित हुईं।
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इस एक्ट्रेस और फिल्म ने बदली मिथुन दा की किस्मत
लगातार 20 फ्लॉप फिल्मों से निराश मिथुन दा के करियर में एक अहम मोड़ आया और उन्हें उस दौर की बेहद बोल्ड और मशहूर अभिनेत्रियों में से एक ममता कुलकर्णी (Mamta Kulkarni) का साथ मिला।
मिथुन दा और ममता कुलर्णी ने अशिम सामंत के निर्देशन में बनी फिल्म अहंकार (Ahankaar) में काम किया। इस फिल्म में मिथुन दा ने एक ऐसे गूंगे व्यक्ति का किरदार निभाया था जो अपने परिवार के लिए सबकुछ कुर्बान कर देता है। वहीं ममता ने मिथुन की वाइफ नैना की भूमिका निभाई थी।
ब्लॉकबस्टर रही थी फिल्म
फिल्म में ममता कुलकर्णी और मिथुन दा की केमिस्ट्री दर्शकों को खूब पसंद आई। बेहतरीन फैमिली ड्रामा होने के साथ-साथ म्यूजिकल हिट भी साबित हुई। फिल्म बॉक्स ऑफिस (Bof Office) पर ब्लॉकबस्टर रही और इसने मिथुन दा के डगमगाते हुए करियर को एक मजबूत सहारा दिया।
अहंकार की कहानी
कहानी मिथुन चक्रवर्ती के किरदार प्रभात के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक नेक दिल इंसान है। एक हादसे में अपनी सौतेली मां को बचाते समय उसकी आवाज चली जाती है और वह गूंगा हो जाता है।
अपनी इस कमी और एक शराबी पिता होने के बावजूद, प्रभात एक फैक्ट्री में कड़ी मेहनत करता है। वह अपनी सौतेली मां, सौतेले भाई सूर्या और बहन का आर्थिक रूप से सहारा बनता है। उसकी बचपन की दोस्त नैना (ममता कुलकर्णी) हमेशा उसके लिए एक मजबूत इमोशनल सपोर्ट बनी रहती है।
प्रभात को फैक्ट्री के मालिक के साथ धोखाधड़ी करने की एक साजिश का पता चलता है। वह भ्रष्ट मैनेजर (प्रेम) को जेल भिजवाकर फैक्ट्री के कारोबार को बचा लेता है। खुश होकर, मालिक प्रभात को मैनेजर का पद देना चाहता है, लेकिन प्रभात निस्वार्थ भाव से इसे ठुकरा देता है और अपने सौतेले भाई सूर्या का नाम आगे बढ़ाता है।
शुक्रगुजार होने के बजाय, प्रभात को दरकिनार कर दिया जाता है और वह बेरोजगार हो जाता है। इसी बीच, सूर्य लालची गैंगस्टरों के चंगुल में फंसकर धोखाधड़ी कर बैठता है, जिससे परिवार की बदनामी होती है।
प्रभात को एक बार फिर खामोशी और हिम्मत के साथ मैदान में उतरना पड़ता है। उसे सब कुछ ठीक करना है, अपने परिवार का नाम साफ करना है, जेल में बंद मैनेजर की बेटी (अनु) और उसके साथियों द्वारा फैलाई गई भ्रष्टाचार की साजिश से लड़ना है और अपने भाई को सही रास्ते पर वापस लाना है।