हॉलीवुड में एक युग का अंत और दूसरे की शुरुआत हो रही है। पैरामाउंट और वॉर्नर ब्रदर्स डिस्कवरी का महाविलय सिर्फ दो बड़ी फिल्म कंपनियों का कारोबारी सौदा नहीं है। यह उस नए ग्लोबल एंटरटेनमेंट मॉडल की ओर इशारा करता है जिसमें स्टूडियो, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, टीवी नेटवर्क, समाचार, खेल और दशकों में तैयार हुई बौद्धिक संपदा यानी IP कुछ विशाल कंपनियों के हाथों में सिमटती जा रही है।
करीब 110 अरब डॉलर के इस सौदे के बाद बनने वाले समूह के पास वॉर्नर ब्रदर्स, पैरामाउंट पिक्चर्स, HBO, CNN, CBS, DC Studios और New Line जैसे ब्रांडों के साथ मनोरंजन की असाधारण लाइब्रेरी होगी। हैरी पॉटर, बैटमैन,सुपरमैन,गेम ऑफ थ्रोन्स,मिशन इंपॉसिबल, टॉप गन, स्टार ट्रेक औरद मेट्रिक्स जैसी फ्रेंचाइजी एक ही कॉरपोरेट छत के नीचे आ जाती हैं।
स्ट्रीमिंग युद्ध का दूसरा दौर
पिछले एक दशक में हॉलीवुड का सबसे बड़ा सवाल था, नेटफ्लिक्स का मुकाबला कौन करेगा? जवाब में लगभग हर स्टूडियो ने अपना स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म खड़ा कर दिया। नतीजा यह हुआ कि दर्शक कई ऐप और सब्सक्रिप्शन के बीच बंट गए और कंपनियां कंटेंट पर अरबों डॉलर खर्च करने लगीं। अब कहानी उलटी दिशा में जा रही है। विस्तार की जगह consolidation यानी एकीकरण शुरू हो गया है।
HBO Max, Paramount+, Pluto TV और Discovery+ जैसे प्लेटफॉर्म एक ही समूह में आने से नई कंपनी नेटफ्लिक्स, डिज्नी और अमेजन को ज्यादा मजबूती से चुनौती दे सकेगी। उसके पास नई फिल्मों और सीरीज के साथ लगभग सौ साल में जमा हुआ कंटेंट भी होगा। लेकिन इतने बड़े विलय का दूसरा पहलू भी है। पहले कोई निर्माता, लेखक या निर्देशक अपना प्रोजेक्ट पैरामाउंट और वॉर्नर दोनों को अलग-अलग बेच सकता था। अब बाजार में एक खरीदार कम हो गया। जितने कम स्टूडियो होंगे, स्वतंत्र निर्माताओं और क्रिएटिव टैलेंट की मोलभाव करने की ताकत उतनी प्रभावित हो सकती है।
सिनेमाघरों के लिए अच्छी खबर?
दिलचस्प बात यह है कि स्ट्रीमिंग के इतने बड़े खिलाड़ी का जन्म फिलहाल सिनेमाघरों के लिए बुरी खबर नहीं है। नई कंपनी ने सालाना 30 से अधिक फिल्में सिनेमाघरों में रिलीज करने की बात कही है। यह महत्वपूर्ण बदलाव है। कुछ वर्ष पहले ऐसा लग रहा था कि स्ट्रीमिंग थिएटर को निगल जाएगी। कोविड के बाद कई बड़ी फिल्में सीधे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पहुंचीं। अब हॉलीवुड फिर समझ रहा है कि बड़ी फिल्म को पहले सिनेमाघर में इवेंट बनाना और बाद में उसे ओटीटी पर लाना आर्थिक रूप से ज्यादा प्रभावी मॉडल हो सकता है।
लेकिन चुनौती भारी कर्ज और लागत घटाने की भी होगी। विलय के बाद अरबों डॉलर की सालाना बचत का लक्ष्य रखा गया है। ऐसे में नौकरियों, विभागों और प्रोडक्शन बजट पर दबाव आना स्वाभाविक है। सवाल यह होगा कि नई कंपनी लागत कम करते हुए क्रिएटिव जोखिम लेने की क्षमता बचा पाएगी या केवल सुरक्षित और स्थापित फ्रेंचाइजी पर निर्भर होती जाएगी।
भारत के लिए बड़ा अवसर
इस पूरे बदलाव का भारत के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। हॉलीवुड की कंपनियां अब केवल फिल्म स्टूडियो नहीं हैं। वे विशाल ग्लोबल कंटेंट इकोसिस्टम बन रही हैं, जिन्हें लगातार फिल्मों, सीरीज, एनीमेशन,वीएफएक्स, पोस्ट -प्रोडक्शन और स्थानीय कहानियों की जरूरत होगी।
भारत के पास तीन बड़ी ताकतें हैं- एक बड़ा दर्शक बाजार, अपेक्षाकृत कम उत्पादन लागत और मजबूत तकनीकी तथा क्रिएटिव प्रतिभा। भारतीय वीएफएक्स और एनीमेशन कंपनियां पहले ही दुनिया की बड़ी फिल्मों और सीरीज पर काम कर रही हैं। अगला कदम केवल हॉलीवुड फिल्मों की सर्विसिंग नहीं, बल्कि भारत को उनके लिए एक प्रमुख फिल्मिंग और प्रोडक्शन डेस्टीनेशन बनाना होना चाहिए। यहीं हमारी फिल्म नीतियों की कमजोरी भी सामने आती है।
हॉलीवुड में कंपनियां जुड़कर बडा आकार लेती जा रही हैं, जबकि भारत में फिल्म निर्माता को अलग-अलग राज्यों की अलग फिल्म पॉलिसी, अलग सब्सिडी, अलग अनुमति प्रक्रिया और अलग नोडल एजेंसी से जूझना पड़ता है। जब सामने वाला स्टूडियो वैश्विक स्तर पर एकीकृत हो रहा हो तो भारत का सिस्टम ज्यादा बिखरा हुआ नहीं रह सकता।
इसीलिए ‘वन नेशन, वन फिल्म पॉलिसी’ जैसे मॉडल पर गंभीरता से विचार करने का समय है। मैंने पहले भी इस पर लिखा है। इसका अर्थ राज्यों की फिल्म नीतियों को समाप्त करना नहीं है। राज्य अपनी लोकेशन, स्थानीय प्रतिभा और अतिरिक्त इंसेंटिव के आधार पर मुकाबला करें, लेकिन शूटिंग अनुमति, केंद्र और राज्य के इंसेंटिव, वीजा, उपकरण आयात और सिंगल-विंडो क्लियरेंस के लिए एक साझा राष्ट्रीय ढांचा बनाया जा सकता है।
पैरामाउंट-वॉर्नर का विलय हॉलीवुड की कहानी है, लेकिन उसका संदेश भारत के लिए भी स्पष्ट है। भविष्य की मनोरंजन अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा केवल अच्छी फिल्म बनाने की नहीं होगी। मुकाबला इस बात का होगा कि कौन-सा देश कंटेंट, टेक्नोलॉजी, प्रतिभा, लोकेशन और नीति को एक साथ जोड़कर वैश्विक क्रिएटिव हब बन सकता है। भारत के पास यह अवसर है। सवाल सिर्फ इतना है कि जब दुनिया के स्टूडियो एक हो रहे हैं, तब क्या हमारी फिल्म नीतियां भी एक-दूसरे से जुड़ने के लिए तैयार हैं?
