Home Box OfficeBox Office Collection Calculation: कैसे कैलकुलेट होती है फिल्म की कमाई, थिएटर वाले को कितना मिलता है इसमें हिस्सा?

Box Office Collection Calculation: कैसे कैलकुलेट होती है फिल्म की कमाई, थिएटर वाले को कितना मिलता है इसमें हिस्सा?

by BollywoodNewsAndMovie


Box Office Collection Calculation: सिनेमाघरों में टिकट खिड़की से लेकर करोड़ों रुपये के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन तक का सफर देखने में जितना आसान लगता है, उसके पीछे वित्तीय गणित और समझौतों का एक बहुत ही जटिल ताना-बाना काम करता है. जब दर्शक कोई फिल्म देखने के लिए टिकट खरीदते हैं, तो उस एक छोटी सी पर्ची के दाम में सरकार का जीएसटी, सिनेमाघर का मुनाफा, डिस्ट्रीब्यूटर का हिस्सा और अंत में फिल्म निर्माता की कमाई जुड़ी होती है. आइए आज इस यहां समझते हैं कि आखिरकार बॉक्स ऑफिस का यह पूरा हिसाब-किताब किस तरह से तय होता है और पर्दे के पीछे पैसे का यह पूरा खेल कैसे चलता है.

फिल्म का बिजनेस और निर्माण की शुरुआत

किसी भी फिल्म की यात्रा उसके निर्माण यानी प्रोडक्शन से शुरू होती है. फिल्म निर्माता (प्रोड्यूसर) अपने पैसों, निवेशकों या स्टूडियो के बलबूते पर फिल्म को पूरी तरह तैयार करता है. फिल्म पूरी होने के बाद, सिनेमाघरों तक इसे पहुंचाने के लिए डिस्ट्रीब्यूटर की एंट्री होती है. प्रोड्यूसर अपनी फिल्म के प्रदर्शन के राइट्स या तो सीधे ऑल-इंडिया डिस्ट्रीब्यूटर को बेच देता है या फिर रेवेन्यू शेयरिंग के आधार पर किसी थर्ड पार्टी के साथ डील फाइनल करता है. यह डिस्ट्रीब्यूटर ही वह अहम कड़ी होता है जो निर्माता और सिनेमाघर मालिकों के बीच तालमेल बिठाकर फिल्म को जनता तक पहुंचाता है.
 
फिल्म के ग्रॉस और नेट कलेक्शन में अंतर

जब आप बॉक्स ऑफिस पर किसी फिल्म के करोड़ों कमाने की खबर सुनते हैं, तो उसमें दो अहम शब्द सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं- ग्रॉस कलेक्शन और नेट कलेक्शन. ग्रॉस कलेक्शन वह कुल रकम होती है जो सिनेमाघरों में टिकटों की बिक्री से सीधे तौर पर बॉक्स ऑफिस पर आती है. इसमें सरकार को दिया जाने वाला टैक्स भी शामिल होता है. वहीं, जब इस कुल राशि में से सरकारी टैक्स और अन्य कटौतियां हटा दी जाती हैं, तब जाकर नेट कलेक्शन निकलता है. यही नेट कलेक्शन वह वास्तविक पैमाना होता है जिससे किसी फिल्म के हिट या फ्लॉप होने का फैसला किया जाता है.

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Box Office Collection Calculation: कैसे कैलकुलेट होती है फिल्म की कमाई, थिएटर वाले को कितना मिलता है इसमें हिस्सा?

टिकट बिक्री और टैक्स का गणित

सिनेमाघरों में बिकने वाली हर एक टिकट पर सरकार का GST अनिवार्य रूप से लगता है. यदि किसी फिल्म की टिकट का मूल्य 100 रुपये से कम है, तो उस पर सरकार द्वारा 12 प्रतिशत की दर से जीएसटी वसूला जाता है. वहीं, अगर टिकट की कीमत 100 रुपये से अधिक है, तो टैक्स का दायरा बढ़कर 18 प्रतिशत हो जाता है. उदाहरण के लिए, यदि आप 200 रुपये की कोई मूवी टिकट खरीदते हैं, तो उसका 18 प्रतिशत हिस्सा यानी 36 रुपये सीधे कर के रूप में कट जाता है, जिसमें 9 प्रतिशत केंद्रीय जीएसटी और 9 प्रतिशत राज्य जीएसटी का हिस्सा होता है.

मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन का शेयर

सिनेमाघरों में टिकट बिकने के बाद जो पैसा बचता है, उसे थिएटर मालिक और डिस्ट्रीब्यूटर के बीच तयशुदा अनुबंध के आधार पर बांटा जाता है. मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में यह बंटवारा हफ्तों के हिसाब से बदलता रहता है. आमतौर पर रिलीज के पहले हफ्ते में कुल कमाई का 50 प्रतिशत हिस्सा डिस्ट्रीब्यूटर को मिलता है, जो दूसरे हफ्ते में घटकर 42 प्रतिशत, तीसरे हफ्ते में 37 प्रतिशत और चौथे हफ्ते के बाद 30 प्रतिशत या उससे कम रह जाता है. इसके विपरीत, अगर फिल्म किसी छोटे शहर या सिंगल स्क्रीन टॉकीज में रिलीज होती है, तो वहां वितरक का हिस्सा शुरुआती हफ्तों में 70 से 90 प्रतिशत तक हो सकता है.

गैर-थिएट्रिकल कमाई के जरिए

सिर्फ सिनेमाघरों की टिकटों से आने वाला पैसा ही फिल्म की कुल कमाई नहीं होता है. निर्माता और डिस्ट्रीब्यूटर की आय के कई अन्य बड़े और सुरक्षित स्रोत भी होते हैं, जिन्हें नॉन-थिएट्रिकल राइट्स कहा जाता है. इसमें फिल्म के सैटेलाइट राइट्स (टीवी पर दिखाने के अधिकार), डिजिटल और ओटीटी प्लेटफॉर्म के स्ट्रीमिंग राइट्स, ऑडियो और म्यूजिक राइट्स, तथा विदेशी बाजारों से होने वाली कमाई शामिल होती है. कई बार फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सामान्य प्रदर्शन करने के बावजूद इन अन्य माध्यमों से भारी मुनाफा कमा लेती हैं.

वितरक से निर्माता तक पैसे कैसे पहुंचते हैं?

सिनेमाघर के मालिक हफ्ते के अंत में अपना कमीशन और खर्च निकालकर बचा हुआ पैसा संबंधित डिस्ट्रीब्यूटर को ट्रांसफर कर देते हैं. इसके बाद डिस्ट्रीब्यूटर अपने अनुबंध के अनुसार अपना मुनाफा और प्रशासनिक खर्च अलग करने के बाद शेष बची हुई भारी-भरकम राशि मूल फिल्म निर्माता (प्रोड्यूसर) को सौंप देता है. इस प्रकार प्रोड्यूसर को अपनी फिल्म की लागत वसूलने और मुनाफा कमाने का मौका मिलता है. यदि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल हो जाती है, तो इस पूरी चेन में सबसे बड़ा वित्तीय नुकसान निर्माता और वितरक को ही उठाना पड़ता है.

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