‘टाइपकास्ट से लड़ना मुश्किल…’ मां के रोल मिलने पर Sheeba Chaddha ने तोड़ी चुप्पी, रामायण में बनी हैं ‘मंथरा’


प्रियंका सिंह, मुंबई। फिल्म की कमाई कलाकार का हौसला बढ़ाती है। यह मानना है अभिनेत्री शीबा चड्ढा (Sheeba Chaddha) का, जो इन दिनों अपने अलग-अलग किरदारों को लेकर चर्चा में हैं। 25 सितंबर को रिलीज होने वाली जी5 की सीरीज बकैती के दूसरे सीजन (Bakaiti Season 2) में वह संयुक्त परिवार का हिस्सा बनी नजर आएंगी।

वहीं उनकी फिल्म मिर्जापुर : द मूवी (Mirzapur: The Movie) की बॉक्स ऑफिस सफलता से भी वह उत्साहित हैं। शीबा कहती हैं कि मिर्जापुर वेब सीरीज के साथ मैं दस साल से जुड़ी रही हूं, ऐसे में फिल्म से हिम्मत बढ़ती है। इस फिल्म में बहुत बड़ी स्टारकास्ट भी नहीं थी, तो इसे हम कलाकारों की जीत कहेंगे।”

फिल्म इंडस्ट्री की प्रक्रिया पर बोलीं शीबा

एक कलाकार के लिए नंबर ज्यादा मायने रखता है या दर्शकों की सराहना? इस पर शीबा कहती हैं कि कॉमर्स और सराहना दोनों अलग होती हैं। जो चीजें सराही जाती हैं, जरूरी नहीं वह पैसे कमाए। जब दोनों चीजें हो जाती हैं, तो वह बढ़िया मिश्रण होता है। फिल्में बनाना महंगा पेशा है, यह इंडस्ट्री ही महंगी है। एक फिल्म को बनाने में बहुत कुछ दांव पर लगा होता है।

इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं, जिसने अपने पैसे लगाए हैं, वह चाहेगा कि उसे कुछ तो मुनाफा मिले, पैसे डूबे ना। यह कला का पेशा है, जो कॉमर्स के साथ जुड़ा हुआ है। जब आर्टिस्टिक वैल्यू के साथ नंबर जुड़ जाते हैं, जैसा मिर्जापुर में हुआ था, उसका प्रभाव आपके अगले काम पर प्रभाव पड़ता है। हालांकि जरूरी नहीं उसके बाद दस काम मिले, लेकिन अच्छे काम मिलते हैं, जो आपके करियर में जुड़ जाता है।

बिना होमवर्क के काम करती हैं शीबा

आगे अपने काम की प्रक्रिया पर शीबा कहती हैं कि मेरे साथ कभी कोई किरदार रहते नहीं हैं, तो मुझे पता नहीं कि मेरी प्रक्रिया क्या है। मैं होमवर्क नहीं करती हूं, न ही अपनी प्रकिया को जानना चाहती हूं।

शीबा के लिए टाइपकास्ट से लड़ना मुश्किल

शीबा को अक्सर मां के रोल दिए जाते हैं, क्या उन्होंने कभी ऐसे रोल से बचने की कोशिश की? इस पर वह कहती हैं कि मुझे लगता है कि टाइपकास्ट तो सभी हो जाते हैं। उसका कुछ नहीं किया जा सकता है। मुझे भी तो एक दायरे के ही रोल मिलते हैं, मां के रोल ही तो सबसे ज्यादा करती हूं।

वही टाइपकास्ट है, बीच में कभी-कभार ऐसे रोल आ जाते हैं, जहां आप पारिवारिक सिस्टम से बाहर कुछ कर रहे हैं। फिर वह नया होता है। इस इंडस्ट्री में आप टाइपकास्ट से लड़ नहीं पाएंगे। जो लिखेंगे, हम वही कर सकते हैं, उसके ऊपर आप नहीं जा सकते हैं। बहुत बार लिखावट का नजरिया नया होता है, तो उसमें बतौर कलाकार खेल सकते हैं, फिर भले ही मां का रोल क्यों न हो।

बदल रहा सिनेमा में महिलाओं से जुड़ा किरदार

आगामी दिनों में शीबा एक ऐसे क्रू के साथ काम करने वाली है, जिसमें अधिकतर महिलाएं होंगी? क्या महिलाओं के लिए रोल और सेट पर जिम्मेदारियों में बदलाव को शीबा महसूस कर पा रही हैं? इस पर वह आगे कहती हैं कि अगर मांओं के किरदारों की बात करूं, तो जो मांएं पहले हम पिछली सदी के सातवें और आठवें दशक में देखते थे, उससे हम काफी आगे निकल चुके हैं।

अब कहानियां भी वैसी नहीं रही हैं कि जिसमें हीरो-हीरोइन, मां और विलेन हो। हालांकि छटछटांकर बात वहीं पर आती है, लेकिन जटिलताएं बढ़ गई हैं।

फिल्म सेट पर महिलाओं के बढ़ते योगदान पर बोलीं शीबा

अब मांओं का भी सफर दिखाया जाता है। अपने आप में उनकी एक जगह है, संवाद होते हैं, जो बांधे रखते हैं। सेट पर भी बदलाव है। हेयर-मेकअप डिपार्टमेंट में महिलाएं हैं, लेकिन अब सिनेमेटोग्राफर से लेकर दूसरे काम भी वह कर रही हैं, हालांकि संख्या कम है। इतने साले में जितनी भी फिल्में की हैं, वहां पूरा यूनिट कभी महिलाओं का नहीं रहा है। अब जो नेटफ्लिक्स की सीरीज कर रही हूं, उसमें पूरा महिलाओं का क्रू है। यह देखकर अच्छा लगा।

अपने रोल के लिए एक्साइटेड रहती हैं शीबा

सिनेमा के लिए कौन सी एक बात शीबा को आज भी उत्सुक करती है? इसे लेकर वह आगे कहती हैं कि अच्छा क्रू और वह पात्र जिसे मैं करने वाली हूं। एक नई दुनिया में जाने को लेकर उत्सुकता रहती है। यह बात खुशी देती है कि आप वो कर रहे है, जो आपको पसंद है। आसपास कई लोग हैं, जिनके पास यह मौका नहीं है। पिछले चार-पांच साल से जिस तरह का काम मेरे पास आ रहा है, वह संतुष्टि दे रहा है।

संयुक्त परिवार में नहीं रह सकतीं शीबा

बकैती के दूसरे सीजन में संयुक्त परिवार और उनके बीच होने वाली छोटी-मोटी नोंक-झोंक दिखाई जाएगी। इस रोल को शीबा ने शिद्दत से जीया है, हालांकि वह खुद कभी संयुक्त परिवार में नहीं रही हैं। वह आगे कहती हैं कि मैं कभी संयुक्त परिवार में रही नहीं हूं। मेरे लिए अब संयुक्त परिवार में रहना कठिन भी होगा, अब आदत भी नहीं रही।

कई लोग आसपास हैं, जो संयुक्त परिवार में रहते हैं, उनके लिए अच्छा है। मैं दिल्ली से मुंबई आई थी, तो सारा परिवार यहां-वहां हो गया है। फिर यहां आकर कई लोग मिले।

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