हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में जिन गीतकारों ने अपनी कलम से आम आदमी के दिलों को छुआ, उनमें ‘अंजान’ का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। लालजी पांडेय, जिन्हें दुनिया अंजान के नाम से जानती है, ने अपने करियर में 300 से अधिक फिल्मों के लिए 1500 से ज्यादा सदाबहार गीत लिखे। उनके लिखे गानों में न केवल सादगी थी, बल्कि पूर्वांचल की माटी की सोंधी खुशबू और भोजपुरी मिठास भी घुली होती थी, जो आज भी संगीत प्रेमियों की जुबान पर रहती है।
गणित के शिक्षक से बॉलीवुड के ‘सदाबहार’ गीतकार तक
अंजान ने साल 1953 में फिल्म ‘गोलकुंडा का कैदी’ के साथ हिंदी सिनेमा में अपने सफर की शुरुआत की। उनके गीतों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे सीधे दिल को छू जाते थे। ‘दे दे प्यार दे’, ‘तेरे जैसा यार कहां’, ‘इंतहा हो गई इंतजार की’ और ‘रोते हुए आते हैं सब’ जैसे गानों ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया। 1970 और 80 के दशक में अमिताभ बच्चन की कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों के गानों को उन्होंने ही अपनी कलम से सजाया था।
विरासत और स्मृतियां
अंजान की विरासत को उनके पुत्र समीर (शीतला पांडेय) ने आगे बढ़ाया, जिन्होंने खुद बॉलीवुड में एक सफल गीतकार के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई है। अंजान के गीतों में प्यार, दर्द और जीवन की हकीकत का जो संगम मिलता था, वह उन्हें अन्य गीतकारों से अलग खड़ा करता था। 3 सितंबर 1997 को 67 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके द्वारा रचित गीतों का खजाना आज भी हिंदी संगीत जगत की अमूल्य धरोहर है।