सोशल मीडिया पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग के गुर्गों द्वारा इस हमले की जिम्मेदारी लेने और सलमान खान के करीबियों को खुलेआम मौत का फरमान जारी करने के बाद, हर कोई एक ही खौफनाक सवाल पूछ रहा है, क्या 90 के दशक का वो खौफनाक अंडरवर्ल्ड, दाऊद और छोटा शकील का वो काला दौर, अब एक नए और ज्यादा खतरनाक अवतार में बॉलीवुड की देहरी पर फिर से लौट आया है?
फिल्म इंडस्ट्री और अंडरवर्ल्ड का कनेक्शन
रुपहले परदे की चकाचौंध और मुंबई के सीलन भरे अंडरवर्ल्ड की दुनिया, इन दोनों के बीच के रिश्ते किसी फिल्मी कहानी से कम रोमांचक और डरावने नहीं रहे हैं। इसकी जड़ें कई दशक पुरानी हैं, जब मायानगरी में फिल्मों के निर्माण के लिए पैसों का जुगाड़ करना आसान नहीं था। उस शुरुआती दौर में जब मेकर्स निजी निवेशकों और कारोबारियों का दरवाजा खटखटाते थे, तभी से हाजी मस्तान जैसे कुख्यात तस्करों का नाम फिल्मी हस्तियों के मेल-जोल और फिल्मों में पैसे लगाने की चर्चाओं के साथ जुड़ने लगा था।
लेकिन समय के पहिए ने जैसे ही 1980 और 90 का दशक पार किया, यह मेल-जोल एक खौफनाक साये में बदल गया। यह वह दौर था जब फिल्म इंडस्ट्री पर अंडरवर्ल्ड का कथित शिकंजा कसने की कहानियां हर तरफ गूंजने लगीं। फिल्म निर्माताओं और कलाकारों को मिलने वाली धमकियों, जबरन रंगदारी वसूलने और फिल्म फाइनेंसिंग के काले कारोबार में इन आपराधिक गिरोहों की पैठ जगजाहिर होने लगी थी। हालात यहां तक आ पहुंचे कि विदेशों में फिल्मों के अधिकार (स्क्रीनिंग राइट्स) और कलाकारों के चयन (कास्टिंग) जैसे अहम फैसलों पर भी परदे के पीछे बैठे इन ताकतों के दबाव के आरोप लगने लगे।
1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में फिल्म फाइनेंसिंग के औपचारिक रास्ते बढ़ने लगे। कॉरपोरेट कंपनियों, बैंकों और संगठित स्टूडियो के आने से फिल्म निर्माण की वित्तीय व्यवस्था में बदलाव हुआ। इससे इंडस्ट्री की फंडिंग पहले के मुकाबले अधिक व्यवस्थित हुई।