भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम दौर में कई ऐसे कलाकार रहे, जिन्होंने अपनी अदाकारी से दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। इन्हीं में से एक नाम प्रदीप कुमार का है, जिन्हें 50 और 60 के दशक में हिंदी फिल्मों का ‘शाही नायक’ माना जाता था। अपनी गरिमामयी उपस्थिति और शालीन व्यक्तित्व के कारण, वे उस दौर के फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद थे, जब भी किसी राजा, राजकुमार, नवाब या शहंशाह के किरदार की बात आती थी।
अभिनय की दुनिया से निजी जीवन तक का सफर
प्रदीप कुमार का पारिवारिक संबंध भी फिल्म जगत से गहरा था। उनके भाई कालिदास बताब्याल एक निर्देशक थे, जिन्होंने उनकी कई फिल्मों का निर्देशन किया था। प्रदीप कुमार की तीन बेटियां बीना बनर्जी, मीना चटर्जी और रीना मुखर्जी थीं, जबकि एक बेटा देवीप्रसाद कुमार बताब्याल था। उनकी बेटी बीना बनर्जी ने अभिनय के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई, वहीं उनके पोते सिद्धार्थ बनर्जी ने साजिद खान की फिल्मों ‘हाउसफुल 2’ और ‘हिम्मतवाला’ में सहायक निर्देशक के रूप में काम किया था। (जूम हिंदी पर यह भी पढ़ें: अनुराधा पौडवाल का बॉलीवुड डेब्यू: जया बच्चन की फिल्म में लता मंगेशकर को रिप्लेस कर बदली थी किस्मत)
तन्हाई में बीता अंतिम समय
पर्दे पर राजसी ठाठ-बाट दिखाने वाले प्रदीप कुमार का निजी जीवन उनके अंतिम वर्षों में बेहद दर्दनाक रहा। रिपोर्ट्स के अनुसार, जीवन के अंतिम पड़ाव पर वे लकवे (पैरालिसिस) से ग्रसित हो गए थे। कहा जाता है कि इस कठिन समय में वे काफी अकेले पड़ गए थे। पत्नी के निधन के बाद उनका अकेलापन और बढ़ गया था। स्थिति इतनी विकट हो गई थी कि बुढ़ापे में उनके पास रहने के लिए अपना घर तक नहीं था। अंततः कोलकाता के एक व्यापारी ने उन्हें अपनी इमारत में रहने की जगह दी। 27 अक्टूबर 2001 को कोलकाता में ही इस दिग्गज अभिनेता ने दुनिया को अलविदा कह दिया, जो उनके शानदार फिल्मी सफर का एक दुखद और खामोश अंत था।
