Nepal School Latest Updates:भारत के पड़ोसी देश नेपाल में प्राइवेट स्कूलों को लेकर अपडेट्स हैं। बढ़ती फीस और मनमानी के आरोपों के बीच स्कूल बंद होने की खबरें सामने आ रही हैं, जो गलत है। सरकार केवल शिक्षा सुधार के तहत फीस की मनमानी रोकने, नियमों का पालन सुनिश्चित करने और कोचिंग सेंटरों पर नियंत्रण की तैयारी कर रही है। 5वीं तक पारंपरिक परीक्षाएं खत्म कर वैकल्पिक मूल्यांकन लागू होगा। भारत के संदर्भ में विशेषज्ञों के अनुसार, प्राइवेट स्कूल बंद करना समाधान नहीं है।
पड़ताल में सामने आया कि नेपाल सरकार शिक्षा सुधार के तहत प्राइवेट स्कूलों की मनमानी रोकने की तैयारी कर रही है, बंद करने का ऐसा कोई आदेश सामने नहीं आया है। नेपाल में मुख्य फोकस अवैध रूप से वसूली गई फीस वापसी, सरकारी नियमों के पालन पर है। सरकारी शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए कोचिंग सेंटरों पर लगाम लगाने और 5वीं कक्षा तक की परंपरागत परीक्षाएं खत्म करने पर है।
नेपाल में सरकार का क्या है उद्देश्य
नेपाल में स्कूलों से जुड़ी खबरों में सामने आया कि नेपाल केशिक्षा मंत्रालय ने प्राइवेट स्कूलों को तय सीमा से अधिक फीस न लेने की चेतावनी दी है। प्राइवेट स्कूलों के बारे में सबसे ज्यादा शिकायतें उनकी फीस को लेकर आती हैं, खासकर उस समय जब एक शैक्षणिक सत्र खत्म होता है और दूसरा शुरू होता है। अभिभावकों ने मंत्रालय, स्थानीय सरकारों और अन्य अधिकारियों से शिकायतें की हैं, जिनमें प्राइवेट स्कूलों पर एडमिशन और सालाना फीस जैसी कैटिगरी के तहत मनमाने ढंग से फीस लेने का आरोप लगाया गया है।
कोचिंग सेंटरों पर भी सख्ती
मंत्रालय ने स्कूलों को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे छात्रों का एडमिशन तभी करें जब शैक्षणिक सत्र शुरू हो जाए। साथ ही कोचिंग सेंटरों की मनमानी रोकने की कोशिशें भी हुई हैं। स्कूल स्तर पर सरकार ने 5वीं क्लास तक के छात्रों के लिए पारंपरिक आंतरिक परीक्षाओं को खत्म कर दिया है। इसके बजाय, उनकी प्रगति का मूल्यांकन वैकल्पिक और मनोवैज्ञानिक तरीकों से किया जाएगा, जिससे तनाव-मुक्त और समग्र सीखने का माहौल बनेगा।
एक्सपर्ट बोले- प्राइवेट स्कूलों को बंद करना समाधान नहीं
प्राइवेट स्कूलों की ऐक्शन कमिटी के अध्यक्ष, भरत अरोड़ा ने कहा, प्राइवेट स्कूलों को बंद करना कोई समाधान नहीं है। दिल्ली में 2 हजार से ज्यादा प्राइवेट स्कूल है। सीबीएसई के देश में 35 हजार स्कूल है, जिसमें से आधे से भी ज्यादा प्राइवेट है। प्राइवेट स्कूल भारत के राष्ट्र निर्माण में स्वतंत्रता के समय से ही एक सशक्त सहयोगी रहे है। शिक्षा में इनोवेशन, गुणवत्ता और व्यापक अवसरों को बढ़ावा देते है। संस्थान सामाजिक उत्तर दायित्व को भी सुदृढ़ करते है। फीस का मुद्दा है तो देश में हर राज्य के ऐक्ट के हिसाब से नियम लागू किए जाते है।
निजी और सरकारी स्कूलों के बीच गुणवत्ता का बड़ा अंतर और सरकारी व्यवस्था की गिरावट इसकी मुख्य वजह है। NEP (National Education Policy) ने ECCE (प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा) को अहम माना है, लेकिन सरकारी स्तर पर इसकी गुणवत्ता कमजोर है। मजबूर होकर अभिभावक निजी स्कूलों पर निर्भर है, जहां फीस, किताबें और यूनिफॉर्म महंगी होती है। प्री-प्राइमरी शिक्षा अब भी अनियमित है, जिससे जवाबदेही की कमी है। नीति जरूरी है।
अशोक अशोक गांगुली, सीबीएसई के पूर्व अध्यक्ष
दिल्ली समेत भारत के प्राइवेट स्कूलों में भी है फीस का मुद्दा
दिल्ली समेत भारत के प्राइवेट स्कूलों में भी मनमानी फीस बढ़ोतरी, एनुअल फीस, अलग-अलग कैटेगरी में फीस को लेकर शिकायतें मिलती रहती हैं। छात्रों और अभिभावकों पर प्राइवेट पब्लिशर्स की महंगी किताबें खरीदने के लिए दबाव डालने के मामले भी सामने आते हैं। इसके अलावा स्टेशनरी से लेकर ड्रेस की खरीद भी स्कूल काउंटर से खरीदने के आरोप भी लगते हैं।