Home Hollywoodबॉलीवुड फिल्म जिसे अकेले देखने पर था ₹10 हजार का इनाम, थ‍िएटर के बाहर तैनात एम्बुलेंस, हॉलीवुड ने की थी मदद – horror film distributors challenged audiences to watch it alone offering a an ambulance stood outside theatres

बॉलीवुड फिल्म जिसे अकेले देखने पर था ₹10 हजार का इनाम, थ‍िएटर के बाहर तैनात एम्बुलेंस, हॉलीवुड ने की थी मदद – horror film distributors challenged audiences to watch it alone offering a an ambulance stood outside theatres

by BollywoodNewsAndMovie


ये कहानी है हॉरर फिल्मों की दुनिया में उस सफल और सबसे डरावनी कही जानेवाली उस फिल्म की, जिसके लिए डिस्ट्रीब्यूटर्स ने रख दी थी बड़ी शर्त। कहते हैं कि डिस्ट्रीब्यूटर ने घोषणा कर दी थी की कि जो भी इस फिल्म को अकेले सिनेमाघर में देखेगा, उसे 10,000 रुपये नकद मिलेंगे और हॉल के बाहर लगा रखा था एम्बुलेंस।

Cult Bollywood horror film that was so terrifying
हॉरर फिल्म थिएटर के बाहर रहता था एम्बुलेंस
डरावनी यानी भुतहा फिल्मों के चाहने वालों की एक बड़ी कैटिगरी है। काफी लोग इस तरह की फिल्में खूब पसंद करते हैं और ये सिनेमाघरों में अच्छा परफॉर्म भी करती थी। एक ऐसी ही कल्ट बॉलीवुड हॉरर फिल्म के बारे में यहां बताने जा रहे हैं जिसे देख पाने के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए थी। इतना ही नहीं डिस्ट्रीब्यूटर्स ने इस फिल्म को लेकर यहां तक शर्त रखी थी कि जिसने थिएटर में ये फिल्म अकेले देख ली, उन्हें 10 हजार रुपये का इनाम मिलेगा। इसके साथ ही कहते हैं कि थिएटर के बाहर हमेशा एक एम्बुलेंस लगा रहता था।

रामसे ब्रदर्स की ‘पुराना मंदिर’ (1984) और ‘वीराना’ (1988) ऐसी हॉरर फिल्मों की लिस्ट में रही हैं जिसने लोगों को जितना ही डराया, उतनी ही इन फिल्मों ने कमाई भी की। ये फिल्में काफी कम बजट में बनी लेकिन इसके बावजूद बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफल रहीं। इन सभी फिल्मों में से जिस फिल्म ने लोगों का गला सबसे अधिक सुखाया वो थी ‘दरवाजा’ जो साल 1978 में रिलीज हुई थी।

करीब दो दशकों तक हॉरर फिल्मों पर अपना दबदबा

हॉरर फिल्मों के सच्चे शौकीन रामसे ब्रदर्स की कहानियों के फैन न हों ऐसा संभव नहीं। ‘महल’ (1949) जैसी क्लासिक फिल्मों और 1960 के दशक की कुछ हॉरर फिल्मों जैसे ‘बीस साल बाद’ (1962), ‘गुमनाम’ और ‘भूत बंगला’ (1965) जैसी तमाम फिल्मों के साथ रामसे ब्रदर्स ने करीब दो दशकों तक हॉरर फिल्मों पर अपना दबदबा बनाए रखा।

अकेले थिएटर में देखने की हिम्मत दिखाएं तो उसे 10,000 रुपये का नकद पुरस्कार

कम बजट में बनी उनकी कई फिल्में ‘पुराना मंदिर’ (1984) और ‘वीराना’ (1988) आदि बॉक्स ऑफिस पर खूब सफल रहीं। हालांकि, सबसे पहले फिल्म ‘दरवाजा’ को लेकर काफी चर्चा रही थी। इस फिल्म के लिए तुलसी रामसे और श्याम रामसे (रामसे ब्रदर्स) ने इंटरनैशनल मेकअप आर्टिस्ट क्रिस्टोफर टकर से सम्पर्क किया। कहते हैं कि ये फिल्म इतनी बड़ी हिट हुई कि डिस्ट्रीब्यूटर्स ने दर्शकों को खुलेआम चुनौती दी थी कि अगर वे इसे अकेले थिएटर में देखने की हिम्मत दिखाएं तो उसे 10,000 रुपये का नकद पुरस्कार दिया जाएगा।’

रामसे की कहानी में लोगों को डराने के लिए भयानक दिखना जरूरी

रामसे फैमिली की तीसरी पीढ़ी दीपक रामसे और अमित रामसे ने ‘दरवाजा’ की कहानी को याद किया। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से बातचीत में दीपक ने बताया, ‘आजकल आपके पास मेकअप के कई ऑप्शन मौजूद हैं। उस समय, बहुत कम ऐसे मेकअप आर्टिस्ट थे जो वास्तव में डरावना मेकअप करना जानते थे। सितारे अपने चेहरे पर चोट लगने पर भी सुंदर दिखना पसंद करते थे, जबकि रामसे की कहानी में लोगों को डराने के लिए भयानक दिखना जरूरी था।’

कहा- हमने क्रिस्टोफर टकर से सम्पर्क किया

उन्होंने बताया कि कुछ भारतीय मेकअप आर्टिस्ट थे, लेकिन हमें लंदन से भी मेकअप आर्टिस्ट बुलाना पड़ता था। उन्होंने कहा, ‘हमने क्रिस्टोफर टकर से सम्पर्क किया था।’ उन्होंने आगे बताया, ‘कुमार जी और तुलसी जी उनसे लंदन में मिले और समझाया कि हमारा बजट बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन हमें उनकी स्पेशलिटी की ज़रूरत है। वे हमारी सीमाओं के भीतर काम करने के लिए सहमत हो गए और उन्होंने फिल्म दरवाजा के लिए मेकअप भेजा। हमने उन्हें पाउंड में भुगतान किया।’

‘किसी ने भी इसे अकेले देखने की हिम्मत नहीं की’

उन्होंने बताया कि हालांकि, इससे उनका बजट थोड़ा बढ़ गया था, लेकिन फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज होते ही बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त कमाई हुई। फिल्म की सफलता को याद करते हुए दीपक ने कहा, ‘आप इसे प्रमोशन का तरीका कह सकते हैं, लेकिन एक डिस्ट्रीब्यूटर ने घोषणा की कि जो भी इस फिल्म को अकेले सिनेमाघर में देखेगा, उसे 10,000 रुपये नकद मिलेंगे। सिनेमाघर के बाहर एम्बुलेंस भी खड़ी कर दी गई थी। फिल्म इतनी सफल रही थी। लेकिन किसी ने भी इसे अकेले देखने की हिम्मत नहीं की।’

अर्चना सिंह

लेखक के बारे मेंअर्चना सिंहअर्चना सिंह नवभारत टाइम्स (डिजिटल) में असिस्टेंट एडिटर हैं। पत्रकारिता की दुनिया में उनका सफर मुंबई से शुरू हुआ, जहां उन्होंने नवभारत टाइम्स अखबार के बाद न्यूज18 के साथ काम किया। साल 2008 से वह दिल्ली में नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से जुड़ी हुई हैं। अपने करियर के दौरान उन्हें विविध भारती के साथ भी काम करने का अवसर मिला, जिसने उनके अनुभवों को तराशा। पत्रकारिता के सफर में उन्होंने क्राइम बीट से लेकर बीएमसी और लोकल न्यूज़ रिपोर्टिंग की जिम्मेदारियां संभालीं। इसके साथ ही फिल्मी पार्टियों, इवेंट्स और फिल्मी कलाकारों के इंटरव्यूज़ कवर किए। मुंबई में आयोजित काला घोड़ा आर्ट्स फेस्टिवल, सेंट जेवियर्स कॉलेज का ‘मल्हार फेस्टिवल’ जैसे इवेंट्स की रिपोर्टिंग भी इनके अनुभव का हिस्सा रही हैं। मुंबई सीरियल ब्लास्ट के दोषी अबू सलेम को जब भारत लाया गया था, उस अहम घटना पर रिपोर्टिंग करने का मौका भी इन्हें मिला।

विशेषज्ञता : नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में रहते हुए अर्चना सिंह ने एंटरटेनमेंट, न्यूज़, बिजनेस और लाइफस्टाइल जैसे कई अहम बीट्स पर काम किया। उन्हें रिसर्च आधारित फिल्मी खबरें, फीचर स्टोरीज और फिल्म या टेलिविजन से जुड़े मुद्दों पर ओपिनियन और एनालिसिस आर्टिकल लिखना खास तौर पर पसंद है। हॉलीवुड और बॉलीवुड की खबरें, एक्सप्लेनर स्टोरीज, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स, फिल्मों और वेब सीरीज के रिव्यू, गॉसिप्स, फीचर कंटेंट, इंटरव्यू और टेलिविजन शोज को फैक्ट-चेक के साथ कवर करने में उनकी अच्छी पकड़ है।

पत्रकारिता का अनुभव: करीब 20 साल के पत्रकारिता अनुभव के साथ, इन्होंने अपने करियर के 18 साल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन को दिए हैं। इस दौरान ये संस्थान के एंटरटेनमेंट डेस्क का अहम हिस्सा रहीं। इनके काम के लिए इन्हें संस्थान की ओर से ‘अचीवर्स ऑफ क्रेडिबल एक्सलेंस ग्रैंड सल्यूट अवॉर्ड’ सहित कई बार बेस्ट परफॉर्मर अवॉर्ड दिया जा चुका है।

अर्चना सिंह ने मुंबई के सोमैया कॉलेज से साइंस विद्याविहार से ग्रेजुएशन किया है। इसके बाद इन्होंने केसी कॉलेज ऑफ आर्ट्स, मुंबई से मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म में पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा किया।और पढ़ें