Explainer: नेट कलेक्शन, ग्रॉस और डिस्ट्रीब्यूटर शेयर में क्या अंतर है? करोड़ों की कमाई का गणित समझिए


नई दिल्ली. बॉक्स ऑफिस पर इन दिनों किसी फिल्म के 100 करोड़ क्लब में पहुंचने की चर्चा है तो किसी के 500 करोड़ पार करने के दावे सुर्खियां बटोर रहे हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि टिकटों से हुई पूरी कमाई आखिर किसके पास जाती है? फिल्म ने 300 करोड़ कमाए तो क्या निर्माता की जेब में भी इतने ही पैसे आए? असल में, बॉक्स ऑफिस की दुनिया में कमाई के कई हिसाब होते हैं. ग्रॉस कलेक्शन, नेट कलेक्शन और डिस्ट्रीब्यूटर शेयर के बीच का अंतर समझना जरूरी है. चलिए समझते हैं कि फिल्मों की करोड़ों की कमाई का गणित कैसे काम करता है.

ग्रॉस कलेक्शन क्या होता है?

ग्रॉस कलेक्शन का मतलब है टिकटों की बिक्री से मिलने वाली कुल रकम, जिसमें टिकट पर लगने वाला टैक्स भी शामिल होता है. यानी दर्शकों ने फिल्म देखने के लिए कुल कितने पैसे खर्च किए, इसे ग्रॉस कलेक्शन कहते हैं. मान लीजिए, किसी फिल्म के टिकटों की कुल बिक्री 118 करोड़ रुपये हुई. इसमें 18 करोड़ रुपये जीएसटी है. ऐसे में फिल्म का ग्रॉस कलेक्शन 118 करोड़ रुपये होगा. ग्रॉस कलेक्शन दर्शकों की तरफ से टिकटों पर खर्च की गई कुल रकम बताता है. यह निर्माता की कमाई नहीं है.

नेट कलेक्शन क्या होता है?

नेट कलेक्शन निकालने के लिए ग्रॉस कलेक्शन में से टिकटों पर लगने वाला टैक्स घटा दिया जाता है. भारतीय बॉक्स ऑफिस की खबरों में फिल्मों की कमाई और रैंकिंग की चर्चा अकसर नेट कलेक्शन के आधार पर होती है. इसे एक उदाहरण से समझिए. अगर किसी फिल्म का ग्रॉस कलेक्शन 118 करोड़ रुपये है और इसमें 18 करोड़ रुपये टैक्स के हैं, तो उसका नेट कलेक्शन 100 करोड़ रुपये होगा. यानी दर्शकों ने टिकटों पर 118 करोड़ रुपये खर्च किए, लेकिन टैक्स हटाने के बाद रकम 100 करोड़ रुपये रह गई.

क्या होता है फुटफॉल?

फिल्मों के बॉक्स ऑफिस के मामले में फुटफॉल का मतलब है कितने लोगों ने सिनेमाघरों में जाकर फिल्म देखी. यानी फिल्म के टिकटों की बिक्री से यह पता चलता है कि कितनी कमाई हुई, जबकि फुटफॉल से पता चलता है कि फिल्म देखने कितने दर्शक पहुंचे. उदाहरण से समझिए कि किसी फिल्म के 10 लाख टिकट बिके. अगर हर टिकट एक दर्शक के लिए था तो फिल्म का फुटफॉल 10 लाख माना जाएगा. वहीं, दूसरी फिल्म के 20 लाख टिकट बिके तो उसका फुटफॉल 20 लाख होगा.

अब मान लीजिए, पहली फिल्म का टिकट औसतन 300 रुपये का था और दूसरी फिल्म का 150 रुपये का. ऐसे में पहली फिल्म ने कम दर्शकों के बावजूद ज्यादा कमाई कर ली हो सकती है. इसलिए बॉक्स ऑफिस पर दो फिल्मों की लोकप्रियता की तुलना करते समय सिर्फ कमाई नहीं, फुटफॉल भी देखा जाता है.

डिस्ट्रीब्यूटर शेयर क्या होता है?

यह बॉक्स ऑफिस के गणित का सबसे अहम हिस्सा है. डिस्ट्रीब्यूटर शेयर को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि फिल्म की टिकटों से हुई कमाई का पूरा पैसा डिस्ट्रीब्यूटर को नहीं मिलता. फिल्म दिखाने के बदले सिनेमाघर भी अपना हिस्सा रखता है. दोनों के बीच कमाई का बंटवारा पहले से तय शर्तों के मुताबिक होता है. इसे एक उदाहरण से समझिए. मान लीजिए, किसी फिल्म ने पहले हफ्ते में 100 करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन किया. अगर तय समझौते के मुताबिक इस रकम का 50 प्रतिशत डिस्ट्रीब्यूटर को और 50 प्रतिशत सिनेमाघर को मिलना है तो डिस्ट्रीब्यूटर के हिस्से में 50 करोड़ रुपये आएंगे. बाकी 50 करोड़ रुपये सिनेमाघर के पास जाएंगे. डिस्ट्रीब्यूटर का यही हिस्सा डिस्ट्रीब्यूटर शेयर कहलाता है. लेकिन हर फिल्म में कमाई का बंटवारा 50-50 नहीं होता. यह फिल्म की लोकप्रियता, रिलीज से पहले हुई डील, सिनेमाघर के साथ समझौते और रिलीज के हफ्ते पर निर्भर कर सकता है. कई समझौतों में पहले हफ्ते डिस्ट्रीब्यूटर को ज्यादा हिस्सा मिलता है, जबकि बाद के हफ्तों में उसका प्रतिशत घट सकता है. डिस्ट्रीब्यूटर शेयर निर्माता का मुनाफा नहीं होता.

फिर निर्माता को कितने पैसे मिलते हैं?

फिल्म के निर्माता की कमाई का हिसाब समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि फिल्म बनाने में कितना पैसा लगा और रिलीज के बाद निर्माता के पास कितनी रकम पहुंची. निर्माता फिल्म बनाने, कलाकारों की फीस, शूटिंग, वीएफएक्स और प्रमोशन पर पैसा खर्च करता है. इसके बाद वह फिल्म से अलग-अलग तरीकों से कमाई करता है. इसे एक उदाहरण से समझिए. मान लीजिए, किसी फिल्म को बनाने और उसके प्रमोशन पर कुल 150 करोड़ रुपये खर्च हुए. फिल्म ने सिनेमाघरों में 200 करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन किया. इसका मतलब यह नहीं कि निर्माता ने 200 करोड़ रुपये कमा लिए. नेट कलेक्शन में से सिनेमाघर और डिस्ट्रीब्यूटर का हिस्सा भी निकलता है. निर्माता को सिनेमाघरों से कितनी रकम मिलेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उसने फिल्म के डिस्ट्रीब्यूशन के लिए क्या समझौता किया है.

इसके अलावा, निर्माता फिल्म के ओटीटी राइट्स किसी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म को बेच सकता है. सैटेलाइट राइट्स से टीवी चैनलों के जरिए और म्यूजिक राइट्स से गानों के इस्तेमाल के जरिए भी कमाई हो सकती है. कई बार ये सौदे फिल्म रिलीज होने से पहले ही तय हो जाते हैं. इनसे मिलने वाली रकम फिल्म की कुल कमाई में जुड़ती है. अब मान लीजिए कि निर्माता को सिनेमाघरों से 80 करोड़ रुपये मिले और ओटीटी, सैटेलाइट व म्यूजिक राइट्स से कुल 100 करोड़ रुपये मिले. इस तरह उसकी कुल कमाई 180 करोड़ रुपये हुई. अगर फिल्म पर कुल खर्च 150 करोड़ रुपये था तो दूसरे खर्चों और समझौते के मुताबिक हिसाब लगाने से पहले 30 करोड़ रुपये का अंतर बचता है. यानी फिल्म का नेट कलेक्शन उसकी कुल बॉक्स ऑफिस कमाई बताता है, जबकि निर्माता का मुनाफा जानने के लिए उसकी वास्तविक आय और कुल खर्च का हिसाब लगाना पड़ता है.

फिल्म हिट या फ्लॉप कैसे तय होती है?

किसी फिल्म का हिट या फ्लॉप होना सिर्फ उसके कुल कलेक्शन से तय नहीं होता. फिल्म की लागत और उससे जुड़े लोगों की रिकवरी भी मायने रखती है. मान लीजिए, एक फिल्म का बजट 50 करोड़ रुपये है और दूसरी फिल्म का बजट 300 करोड़ रुपये. दोनों 100 करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन करती हैं. पहली फिल्म के लिए यह नतीजा अच्छा हो सकता है, जबकि दूसरी फिल्म के लिए लागत की भरपाई करना मुश्किल हो सकता है. हालांकि, आखिरी फैसला करने के लिए सिर्फ बजट और नेट कलेक्शन की तुलना पर्याप्त नहीं है. ओटीटी, सैटेलाइट और म्यूजिक राइट्स से हुई कमाई के साथ डिस्ट्रीब्यूटर की रिकवरी भी देखनी होगी.



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