Home Box Officeस्टारडम पर भारी पड़ा कंटेंट, छोटी फिल्मों ने बदली सिनेमा की किस्मत; सफलता का लिखा इतिहास

स्टारडम पर भारी पड़ा कंटेंट, छोटी फिल्मों ने बदली सिनेमा की किस्मत; सफलता का लिखा इतिहास

by BollywoodNewsAndMovie


स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। ‘अल्फा’, ‘टाक्सिक’, ‘हैवान’, ‘ओ रोमियो’, ‘धमाल 4’ और ‘काकटेल 2’ जैसी बड़े सितारों और बड़े बजट वाली फिल्में इस साल बाक्स आफिस पर असफल रहीं। वहीं ‘मैं वापस आऊंगा, ‘हांटेट 3 डी : इकोज आफ द पास्‍ट’, ‘हनुमान अंश’, ‘आवारापन 2’, ‘कृष्णावतारम पार्ट 1’ और ‘मिर्जापुर: द मूवी’ जैसी फिल्मों ने दर्शकों का ध्यान खींचा, जबकि इनमें स्थापित सुपरस्टार नहीं है।

दर्शक हो गए हैं स्मार्ट

क्‍या यह किसी बड़े बदलाव का संकेत हैं इस बाबत ट्रेड एनालिस्‍ट तरण आदर्श कहते हैं- बदलाव तो कुदरत का नियम है कि हर समय कुछ ना कुछ बदलते रहता है। हनुमान अंश और मिर्जापुर में कोई नामचीन स्‍टार न होने के बावजूद दोनों फिल्में दर्शकों की भीड़ जुटा पाने में कामयाब हुई है, इससे साबित होता है कि दर्शक सिनेमाघरों में सिर्फ बड़े सितारों के लिए नहीं जा रहे हैं।

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हैवान फिल्‍म नहीं चली। जबकि अक्षय और प्रियदर्शन ने तो गत अप्रैल में ही भूत बंगला जैसी बड़ी हिट फिल्‍म दी है। इससे पता चलता है कि दर्शक हमेशा से स्मार्ट रहे हैं, उन्हें कमतर मत आंकिए। दर्शक हमेशा फिल्मकारों को अपने अंदाज में कुछ न कुछ सिखा जाते हैं। वह हमेशा कुछ न कुछ नया लाते हैं और फिल्मकारों को बताते हैं कि

कैसी फिल्में चलती हैं और कैसी नहीं।

वहीं बड़े सितारों और बड़े बजट की फिल्मों की असफलता के बीच छोटे बजट और बिना स्थापित सितारों वाली फिल्मों की सफलता पर फिल्‍ममेकर सुनील दर्शन का मानना है कि इससे दर्शकों को अलग-अलग विषयों और शैलियों की फिल्में देखने का अवसर मिलता है। वह कहते हैं पिछले साल सैयारा, महावतार नरसिम्‍हा जैसी फिल्‍में भी हिट हुई थी। ऐसी फिल्मों का आना हमेशा स्वागत योग्य है, क्योंकि इससे सिनेमा में विविधता आती है।

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दर्शकों को अलग-अलग तरह का कंटेंट देखने को मिलता है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि बड़े सितारों की फिल्में न चलने का कारण भी कई बार वही बड़े सितारे खुद होते हैं। उन्हें लगता है कि फिल्म उनके नाम से चलती है, जबकि असल में फिल्म अपनी कहानी के दम पर चलती है। अमिताभ बच्चन साहब जब अपने चरम पर थे, तब भी डॉन चल जाती थी और
बेशर्म नहीं चलती थी।

सिनेमा की गुणवत्ता अच्छी होनी चाहिए

अच्छी फिल्म बनाने में लेखक, संगीतकार, निर्माता और निर्देशक की भागीदारी होती है। हालांकि अब ऐसा लगता है कि छोटे बजट की फिल्मों को स्टार पावर के मुकाबले ज्यादा अवसर मिल सकते हैं, क्योंकि ओटीटी ने कहीं न कहीं स्टार पावर की अहमियत कम कर दी है। साल 1975 में जय संतोषी मां फिल्म आई थी। उसके बाद इसी तरह की लगभग सौ पौराणिक फिल्में बनीं, लेकिन उनमें से कोई भी नहीं चली। इसलिए आप किसी सामूहिक अंधानुकरण के आधार पर नहीं चल सकते।

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अगर सिनेमा की गुणवत्ता अच्छी है, तो वह निश्चित रूप से चलेगा। अगर वह नहीं भी चलता, तो हो सकता है कि उसे उतने स्क्रीन न मिलें, इसलिए उसकी पहुंच कम रह जाए, लेकिन उसकी खुशबू को दबाया नहीं जा सकता। सिनेमा का मतलब सबसे अच्छी फिल्म बनाना नहीं था। सिनेमा का मतलब ऐसी फिल्म बनाना था, जिसे सबसे ज्यादा लोग देखें।

भारत की सभी सुपरहिट फिल्मों का अगर आप विश्लेषण करेंगे, तो वे उस साल की सबसे अच्‍छी फिल्में नहीं थीं। सबसे अच्छी फिल्म शायद बिमल राय या ऋषिकेश मुखर्जी की होती, लेकिन वे कभी भी कमाई के मामले में टाप पांच में नहीं आतीं।

प्रमोशन का बदला ट्रेंड

वहीं इंटरनेट मीडिया पर फिल्‍मों को लेकर होने वाले प्रचार और माउथ पब्लिस्टिी को लेकर निर्माता विनोद बच्‍चन कहते हैं- आवारापन 2 के लिए मुझे नहीं लगता कि उन्होंने सोशल मीडिया पर कोई खास पैसा खर्च किया होगा। फिल्म का कंटेंट अच्छा था, म्यूजिक अच्छा था, इसलिए वह चली।

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बाकी सिनेमा तो सिनेमा है। छोटा और बड़ा कुछ नहीं होता। जो चल जाए, वह बड़ा सिनेमा है; जो नहीं चले, वह छोटा सिनेमा है। आजकल लोग नए कंटेंट को ज्यादा देखना पसंद करते हैं। हनुमान अंश का कंटेंट अच्छा था, लेकिन वह दब गई। फिर जैसे-जैसे माउथ पब्लिसिटी से फिल्म लोगों के बीच चर्चा में आई, लोगों ने उसे देखना शुरू कर दिया।

आजकल माउथ पब्लिसिटी ही सबसे अच्छी पब्लिसिटी है। यह जरूरी नहीं है कि अगर आपने फिल्म को बड़े पैमाने पर सिनेमा में रिलीज किया है, तो वह तुरंत 500 करोड़ कमा लेगी। कभी-कभी फिल्म धीरे-धीरे पिकअप करती है और हनुमान अंश इसका देश के लिए सबसे अच्छा उदाहरण है।

टाक्सिक और हैवान फिल्‍मों की रिलीज के बाद इंटरनेट मीडिया पर सवाल उठाया गया कि यह फिल्म क्यों बनाई गई?

फिल्‍म बनाने को लेकर निर्माता की जिम्‍मेदारी पर विनोद बच्‍चन कहते हैं- देखिए, निर्माता और निर्देशक यह नहीं सोचते कि मैं कोई खराब सिनेमा या बुरी फिल्म बना रहा हूं। वे हमेशा अच्छी फिल्म बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कभी-कभी गलतियां हो जाती हैं।

कभी-कभी वे यह समझ नहीं पाते कि जो वे सोच रहे हैं, वह दर्शकों के साथ काम करेगा या नहीं। ऐसा होता रहता है। जब गलती हो जाए, तो उसे समझना चाहिए कि हां, यह गलती थी या हम जो सोच रहे थे, वह काम नहीं कर पाया। कभी-कभी समय भी खराब होता है। टाइमिंग की भी बात होती है।

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